एक तरफ प्रदेश के विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोह में करोड़ों रुपए खर्च कर डिग्रियां बांट रहे हैं, दूसरी तरफ मानद उपाधियों को लेकर स्पष्टता नजर नहीं आ रही है। पिछले 3 साल में प्रदेश के 12 विश्वविद्यालयों ने 52 लोगों को मानद उपाधियां दीं, जबकि 14 विश्वविद्यालयों ने एक भी व्यक्ति को मानद उपाधि नहीं दी। विश्वविद्यालयों के एक्ट के अनुसार मानद उपाधियां ऐसे व्यक्तियों को दी जाती हैं, जिनका अवदान ज्ञान की विभिन्न शाखाओं या समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय रहा हो। यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान एक्ट, 1946 के सेक्शन 34ए के अनुसार मानद उपाधि देने के लिए स्टैंडिंग कमेटी होती है, जिसमें वीसी के अलावा हाईकोर्ट जज भी शामिल होंगे। किसी व्यक्ति को मानद डिग्री तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक प्रस्ताव इस कमेटी द्वारा मूल रूप से प्रस्तावित, सिंडिकेट द्वारा अप्रूव्ड, सीनेट द्वारा पास और कुलाधिपति द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाए। इन्हें विवि ने दी मानद ​उपा​धियां जेएनवीयू, जोधपुर ने 5, एमएलएसयू, उदयपुर ने 2, शेखावाटी विवि, सीकर ने 3, गंगासिंह विवि, बीकानेर ने 1, बृज विवि, भरतपुर ने 10, संस्कृत विवि, जयपुर ने 7, आयुर्वेद विवि, जोधपुर ने 2, कृषि विवि, बीकानेर ने 5, कृषि विवि, जोबनेर ने 1, कृषि विवि, जोधपुर ने 1, तकनीकी विवि, बीकानेर ने 6 और स्वास्थ्य विवि, जयपुर ने 9 विद्वानों को मानद उपाधियां दीं। इन्होंने नहीं दी : राजस्थान यूनिवर्सिटी, लॉ विवि, जयपुर, कोटा विवि, मत्स्य विवि अलवर, दयानंद सरस्वती विवि अजमेर, बांसवाड़ा विवि, पत्रकारिता विवि, एमबीएम, एनएलयू, वीएमओयू, एग्रीकल्चर उदयपुर, कोटा, आरटीयू और स्किल विवि शामिल हैं। मानद उपाधि देने के नाम पर बंदरबांट हो रही है। कई कुलगुरु और कुलसचिव सहित विवि के लोग स्वार्थ सिद्ध करते हैं। लोकभवन को मानद उपाधि देने के नियमों की समीक्षा करके ठोस दिशा-निर्देश लागू करने चाहिए। -प्रताप सिंह सिंघवी, विधायक