अलवर नगर निगम चुनाव में मेयर की कुर्सी हासिल करने के लिए बीजेपी इस बार हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है। पिछले चुनाव में बहुमत के बावजूद मिली करारी हार से करीब-करीब यह तय है कि पिछली बार क्रॉस वोटिंग का शक झेल रहे पार्षदों को मेयर की दौड़ से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा। पार्टी के पास अब केवल दो ही विकल्प बचे हैं। या तो किसी बिल्कुल नए चेहरे पर दांव खेला जाए, या फिर पिछली बार चुनाव हारे प्रत्याशी को दोबारा मैदान में उतारकर मौका दिया जाए। बहुमत के बाद भी गंवाई थी सीट साल 2019 के नगर परिषद चुनाव में भाजपा के 27 और कांग्रेस के 19 पार्षद जीतकर आए थे, जबकि 19 निर्दलीय उम्मीदवार जीते थे। लगभग आधे निर्दलीय पार्षदों का समर्थन भी भाजपा के साथ था। इसके बावजूद भाजपा के मेयर प्रत्याशी धीरज जैन 9 वोटों से चुनाव हार गए थे। कुल 65 वार्डों में से कांग्रेस प्रत्याशी बीना गुप्ता 37 और बीजेपी के प्रत्याशी धीरज जैन को 28 वोट ही मिले थे। पार्टी के ही 8 से 10 पार्षदों ने सेंधमारी करते हुए कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी थी, जिससे मोटा खर्च और स्पष्ट जनादेश होने के बावजूद भाजपा के हाथ से सीट निकल गई थी। दिग्गजों के सामने दोहरी चुनौती हार के बाद जांच समिति और बड़े नेताओं को संदिग्ध पार्षदों के नाम भेजे गए थे। हालांकि वे नाम सार्वजनिक नहीं हुए, लेकिन वे सभी चेहरे अब संगठन की सूची (रडार) में हैं। भाजपा के दिग्गज नेताओं के सामने इस बार दो बड़ी चुनौतियां हैं: क्रॉस वोटिंग वालों का टिकट कटना तय: जिन पार्षदों ने पिछली बार अपनी ही पार्टी को धोबीपछाड़ दी थी, उन्हें इस बार मेयर का टिकट उनको मिलना बहुत मुश्किल है। बगावत का डर: अगर क्रॉस वोटिंग वाले चेहरों में से किसी को टिकट दिया गया, तो पिछली बार हराए गए खेमे के पार्षद दोबारा बगावत कर सकते हैं। वहीं, टिकट कटने पर भी भीतरघात की संभावना बनी रहेगी। अब आगे क्या? पार्टी की प्राथमिकता एक ऐसा निर्विवाद चेहरा लाने की है जिसके साथ अधिक से अधिक पार्षद एकजुट हो सकें। ऐसे में या तो किसी नए और निष्ठावान पार्षद को आगे किया जाएगा, या फिर पिछले प्रत्याशी को दोबारा मौका देकर पुरानी हार का हिसाब चुकता करने का दांव खेला जा सकता है।