जानिए भाजपा की हार की 5 प्रमुख वजह नगर निगम चुनाव के नतीजे भारतीय जनता पार्टी के लिए किसी बड़े राजनीतिक झटके से कम नहीं रहे। पार्टी को यहां करारी हार मिली। इस हार के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर उपजा ‘अहं’ और ‘वहम’ था जिसने संगठन को अंदर से खोखला कर दिया। टिकट वितरण से लेकर प्रशासनिक मशीनरी की मनमानी तक, कई ऐसी भूलें रहीं जिनका परिणाम वही हुआ जिसकी आशंका पहले ही जताई जा रही थी। स्थिति यह थी कि टिकट वितरण के समय न तो किसी विधायक, न सांसद और न ही प्रभारी और न संगठन ने किसी की सुध ली। प्रभारियों ने प्रदेश नेतृत्व को पूरी तरह अंधेरे में रखा, क्योंकि वे खुद यहां नेताओं की तरह गुटबाजी और अपने चहेतों को उपकृत करने में उलझे रहे। नतीजा यह हुआ कि प्रदेश नेतृत्व तक सही फीडबैक पहुंच ही नहीं पाया। 1: सरकार के खिलाफ एंटी-इन्कम्बेंसी और प्रशासनिक मनमानी : पिछले पांच सालों में शहर में टूटी सड़कें, बजबजाती नालियां, ओवरफ्लो सीवरेज और जनसुनवाई के बजाय अधिकारियों का आम जनता व पार्षदों से टकराव सबसे बड़े चर्चा के विषय रहे। सरकार को तीन साल हो चुके हैं। वार्डों के कोई नए टेंडर नहीं लगे इसका जवाब वोट की चोट से ही दिया। 2: जिताऊ चेहरों की अनदेखी और अपनों को टिकट देने की जिद : दावा किया गया कि केवल जिताऊ उम्मीदवारों को टिकट मिलेगा। लेकिन वितरण में नेताओं की मनमर्जी चली और सिर्फ अपनों को तवज्जो दी गई। नामांकन के अंतिम दिन महावीर रांका का टिकट काटकर वैश्य वर्ग को निराश कर दिया गया। करीब 16 सामान्य सीटों पर ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों को उतार दिया गया, जिससे पारंपरिक सामान्य (सवर्ण) वर्ग बुरी तरह बिदक गया। 3: यूजीसी रोल बैक और सवर्ण वोट बैंक की नाराजगी : चुनावी माहौल में ‘यूजीसी रोल बैक’ का मुद्दा एक बड़ा नासूर बन गया। मुख्यमंत्री के रोड-शो तक में इस नारे के गूंजने के बावजूद भाजपा नेताओं ने शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन छुपा ली और मान बैठे कि सब ठीक है। लेकिन वे यह भूल गए कि जनता सब याद रखती है। सवर्ण वोट बैंक भाजपा का सबसे मजबूत और पारंपरिक कोर वोटर माना जाता है, लेकिन यूजीसी के मुद्दे पर उपजी नाराजगी सीधे जमीन तक पहुंच गई थी। शहर के कई वार्डों में इसके विरोध में बैनर तक लग गए। करणी सेना और अन्य संगठनों के सक्रिय होने से भाजपा का यह मूल मतदाता छिटक गया। 4: कमजोर संगठन और प्रभारियों की गुटबाजी : पार्टी के महामंत्री, उपाध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष जैसे पदाधिकारी खुद टिकट लेकर चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे थे। ऐसी स्थिति में संगठन चुनाव क्या संचालित करता, सारे उम्मीदवार अपने दम पर लड़ने को मजबूर थे। पार्टी के बड़े और प्रमुख नेता भी सिर्फ उन्हीं इलाकों में प्रचार के लिए गए जहां उनकी जीत पहले से ही पक्की (श्योर) मानी जा रही थी। 5: नए मतदाता और जेन-जी फैक्टर की अनदेखी : करीब 20 हजार से अधिक नए युवा मतदाताओं के आवेदन के बाद वोटर आईडी कार्ड तो बन गए लेकिन उनका नाम अंतिम मतदाता सूची में जुड़ नहीं पाया। जेन-जी से जुड़े मुद्दों, यूजीसी रोल बैक और अन्य स्थानीय मुद्दों को लेकर उच्च वर्ग के साथ-साथ ओबीसी वर्ग के युवा भी भाजपा से दूर होते चले गए। इन तमाम अंदरूनी और बाहरी कारणों ने मिलकर भाजपा के विजय रथ को रोक दिया।