नगर निगम के चुनावी गणित ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। महज 24 घंटे के भीतर राजनीति के ऐसे रंग देखने को मिले, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। कांग्रेस पार्टी ने एक दिन पहले ही 80 में से 50 पार्षदों का जादुई आंकड़ा छूकर अपना मेयर बेहद आसानी से बना लिया था। वहीं अगले ही दिन डिप्टी मेयर के चुनाव में पार्टी औंधे मुंह गिर पड़ी। मेयर चुनाव में 50 वोट हासिल करने वाली कांग्रेस डिप्टी मेयर चुनाव में अपने 12 वोट गंवा बैठी और उसके हाथ सिर्फ 38 वोट ही लगे। इसके उलट मेयर चुनाव में महज 30 सीटों पर सिमटकर रह गई भारतीय जनता पार्टी ने जबरदस्त वापसी करते हुए डिप्टी मेयर पद पर कब्जा जमा लिया। भाजपा के पंकज गहलोत ने 40 वोट हासिल कर जीत दर्ज की जबकि कांग्रेस की प्रत्याशी नसीम बानो 38 वोट पाकर चुनाव हार गईं। इस चुनाव में एक वोट नोटा को गया और एक वोट खारिज हो गया। इस अप्रत्याशित परिणाम के बाद दो बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। पहला यह कि आखिर 24 घंटे के भीतर ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस अपने ही पार्षदों को संभाल नहीं पाई और 12 वोटों की सेंधमारी का शिकार हो गई? दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो भाजपा मेयर चुनाव में सिर्फ 30 वोटों पर सिमट गई थी वह अचानक डिप्टी मेयर के चुनाव में 42 के आंकड़े पर कैसे पहुंच गई? इन दोनों सवालों के जवाब बीकानेर नगर निगम की इनसाइड स्टोरी और दोनों दलों के भीतर मचे घमासान के भीतर छिपे हैं। डिप्टी मेयर के उलटफेर में भगवानसिंह मेड़तिया चैंज मेकर बने। आधी रात कांग्रेस में रार, सुबह तक नहीं हो सके एकजुट मेयर चुनाव की जीत की खुशी कांग्रेस खेमे में ज्यादा देर टिक नहीं पाई। डिप्टी मेयर पद के लिए पार्टी के भीतर एक-दो नहीं बल्कि पांच-पांच दावेदार खुलकर आमने-सामने आ गए। निगम के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और सबसे ज्यादा बार पार्षद चुनकर आए जावेद पड़िहार, पूर्व नेता प्रतिपक्ष चेतना डोटासरा, हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए मनोज बिश्नोई समेत कई नाम टिकट की दौड़ में शामिल हो गए। विवाद तब गहरा गया जब कुछ नेताओं ने जावेद पड़िहार के नाम का कड़ा विरोध किया और बीकानेर पूर्व से नसीम बानो, जावेद खान तथा सपना मारू के नाम आगे बढ़ा दिए। इस विरोध से जावेद इस कदर नाराज हुए कि वे बीच मीटिंग से ही उठकर बाहर चले आए। रातभर पार्टी के वरिष्ठ नेता सबको मनाने और डैमेज कंट्रोल में जुटे रहे, लेकिन असंतोष की आग अंदर ही सुलगती रही। अगले दिन जब नामांकन का समय आया तो कांग्रेस की तरफ से नसीम बानो और मनोज बिश्नोई समेत कुल 4 लोगों ने पर्चे दाखिल कर दिए। हालांकि ऐन वक्त पर पार्टी के दबाव में नसीम बानो को छोड़कर बाकी सभी ने अपने नाम वापस ले लिया लेकिन इस फैसले से पार्टी के भीतर का एक बड़ा धड़ा बुरी तरह असंतुष्ट था। परिणाम यह हुआ कि मतदान के वक्त वही असंतोष क्रॉस वोटिंग के रूप में बाहर आया और कांग्रेस अपनी ही जीत के जश्न के अगले दिन डिप्टी मेयर की कुर्सी गंवा बैठी। भाजपा की रणनीति और बगावत: कैसे पलटी बाजी? भारतीय जनता पार्टी के लिए मेयर पद के चुनाव में हार का सबसे बड़ा कारण उनका अंदरूनी विवाद और टिकट चयन से बरती गई असवाधानियां बताई जा रही हैं। कांग्रेस ने तो प्रदेश नेतृत्व की ओर से भेजी गई विशेष टीम के जरिए पार्षदों से वन-टू-वन रायशुमारी की थी जिसमें सबसे ज्यादा सहमति अनिल कल्ला के पक्ष में थी, जिससे वहां प्रत्याशी चयन आसान हो गया था। इसके विपरीत भाजपा में प्रत्याशी चयन के दौरान स्थानीय पार्षदों की राय लेना तो दूर, उनसे कोई औपचारिक चर्चा तक नहीं की गई। सूत्र बताते हैं कि यदि पार्टी को सुरेंद्र सिंह शेखावत को ही मैदान में उतारना था तो भी पार्षदों को भरोसे में लिया जाना चाहिए था। लेकिन प्रदेश से बाहर से आए एक लीडर, प्रदेश के एक प्रभारी और चूरू के एक कद्दावर नेता के कथित दबाव के चलते बिना जमीनी हकीकत जाने सुरेंद्र को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। चूंकि भाजपा पहले से ही संख्या बल के मामले में अल्पमत में थी। ऊपर से नवनिर्वाचित पार्षदों के साथ सुरेंद्र सिंह के रिश्ते भी खट्टे-मीठे थे। यह नाराजगी सिर्फ पार्षदों तक सीमित नहीं थी। बाड़ेबंदी के दौरान ऐसे लोगों ने भी दखल दिया जो खुद पार्षद नहीं हैं, लेकिन उनकी मेयर प्रत्याशी से नहीं पटती थी। इसका सीधा असर यह हुआ कि भाजपा खेमे में करीब 11 पार्षदों की क्रॉस वोटिंग की बातें खुलकर सामने आने लगीं। एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर भास्कर से बातचीत में साफ कहा कि बीकानेर की राजनीति चूरू से नहीं चलाई जा सकती, क्या यहां योग्य नेताओं की कमी है? मेयर प्रत्याशी के चयन से उपजे इसी रोष के कारण पार्षदों ने मेयर चुनाव में तो अपनी नाराजगी दिखाई, लेकिन डिप्टी मेयर के चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी असली ताकत का अहसास करा दिया। डिप्टी मेयर के चुनाव में पंकज गहलोत को जिताकर पार्टी के उस दूसरे धड़े ने यह साबित कर दिया कि यदि पूरी भाजपा एकजुट होकर मैदान में उतरती, तो परिणाम कुछ और ही होते।