नगर निकाय चुनाव में कांग्रेस अपने परंपरागत वोटों को एकजुट कर झुंझुनूं नगर परिषद में अपना बोर्ड बचाने में कामयाब रही। विधानसभा उपचुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के खिसकने के कारण करारी हाल झेलने वाली कांग्रेस ने अपने परंपरागत वोट को ध्यान में रखते हुए टिकट बांटे। इसमें जाट, मुस्लिम, एससी को तवज्जो दी। जिन वार्डों में जिस जाति के मतदाता अधिक थे उन्हें टिकट देकर मैदान में उतारा। इसके उलट टिकट वितरण में उलझी भाजपा आखिर तक पिछड़ती नजर आई। कांग्रेस ने रणनीति के तहत कुछ वार्डों को खाली छोड़ा, जहां भाजपा का कैडर वोट बैंक भी छीन लिया। नतीजा निर्दलीयों से हार का सामना करना पड़ा। वार्ड 9 में वीरेंद्र डारा, वार्ड 43 में मनोज सैनी जैसे मजबूत प्रत्याशियों के सामने कांग्रेस ने प्रत्याशी नहीं उतार कर भाजपा को हराने की बिसात बिछाई थी। कम मतदान कांग्रेस के लिए शुभ रहा : नगर परिषद के चुनाव में कम वोटिंग कांग्रेस के लिए शुभ संकेत रहा है। पिछले चार चुनावों से ऐसा ही हो रहा है। साल 2004 से यही ट्रेंड चलता आ रहा है। 2004 में 66.87% मतदान रहा था। भाजपा बोर्ड बनाने में सफल रही। 2009 में मतदान 38.23% रहा। कांग्रेस ने जीत दर्ज की। 2014 में वोटिंग 78% हो गया। भाजपा बोर्ड में काबिज हुई। इसके बाद 2019 में फिर गिरावट आई और 76.80% वोटिंग हुई। तो कांग्रेस ने बोर्ड बना लिया। भाजपा को टिकट वितरण के बाद कई वार्डों में अपने ही नेताओं की बगावत का सामना करना पड़ा। नगर परिषद के लगभग 10 से अधिक वार्ड ऐसे थे, जहां भाजपा से बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों ने पार्टी प्रत्याशियों के वोट काटे, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस व निर्दलीय उम्मीदवारों को मिला और भाजपा वहां चुनाव हार गई। उदाहरण के तौर पर वार्ड 8, 44, 50 में बागियों के मैदान में डटे रहने से त्रिकोणीय मुकाबला बना और भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा।