नगर की सियासत में इन दिनों युवा चेहरों की चर्चा जोरों पर है, लेकिन राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि जयपुर निगम के पिछले दो चुनाव में 36 साल से अधिक उम्र के पार्षदों का दबदबा रहा। 2014 में कुल 91 में से 63 यानी 69.2 फीसदी, जबकि 2020 में जयपुर ग्रेटर और हेरिटेज के कुल 250 विजेताओं में 177 यानी 70.8 फीसदी पार्षद 35 साल या उससे अधिक उम्र के रहे। 2020 में 21 से 29 साल के 30 और 30 से 35 साल के 43 पार्षद समेत 35 साल तक के कुल 73 यानी 29.2 फीसदी विजेता थे। वहीं 36 से 50 साल के 123 यानी 49 फीसदी थे। इनमें 41 से 45 साल के 51 पार्षद जीते थे। 2020 में 35 साल तक के कुल 73 विजेताओं में कांग्रेस के 39, भाजपा के 29 और 5 निर्दलीय थे। 2020 के 250 पार्षदों की औसत उम्र 41.8 वर्ष, जबकि 2014 में औसत उम्र 43 वर्ष रही। भास्कर एक्सपर्ट - पुष्पकुमार स्वामी, विश्लेषक ज्यादा युवा तो बदलेगी सियासत युवा पार्षदों की संख्या बढ़ने से शहर के राजनीतिक मुद्दे और काम करने के तरीके पर असर दिखाई देगा। नई पीढ़ी सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मतदाताओं से सीधे संवाद करने में सहज है। युवा पार्षदों पर अपने वार्ड में तुरंत परिणाम दिखाने का दबाव होगा। ऐसे में युवा और अनुभवी नेतृत्व का संतुलन बनता है तो शहर की समस्याओं के समाधान में गति आएगी। दलों के पास बायोडाटा की बाढ़ चुनाव में भाजपा-कांग्रेस की नई टिकट पॉलिसी से सियासी माहौल गरमा गया है। जयपुर के 150 वार्ड में से हर एक के लिए औसत 15 से 25 दावेदारों ने बायोडाटा दिया है। दोनों पार्टियों के पास 5,000 तक बायोडाटा पहुंचने का अनुमान है।