स्वच्छता सर्वेक्षण में ऑनलाइन शिकायतों के निस्तारण में भले ही नगर परिषद को प्रदेश में बेहतर रैंकिंग मिल रही हो, लेकिन शहर की जमीनी तस्वीर इससे अलग है। ₹12 करोड़ सालाना बजट, 290 सफाईकर्मी और करीब 50 वाहनों के संसाधन होने के बावजूद कई इलाकों में सड़क किनारे कचरे के ढेर, लावारिस पशु और कुत्तों की समस्या बनी हुई है। नगर पालिका से नगर परिषद बनने के बाद वार्डों की संख्या 35 से बढ़कर 45 हो गई, लेकिन सफाई व्यवस्था का ढांचा उसी अनुपात में मजबूत नहीं हुआ। नियमित मॉनिटरिंग की कमी और कर्मचारियों की कमी से घर-घर कचरा संग्रहण व्यवस्था भी प्रभावित है। पिछले साल स्वच्छता रैंकिंग में शहर 309 निकाय में 25वें स्थान पर रहा था। कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग करने के लिए तैयार नई सफाई नीति अब तक लागू नहीं हो सकी है। वहीं नगर परिषद बनने के बाद बढ़ी आबादी और क्षेत्रफल के अनुसार नए सफाईकर्मियों के पद भी स्वीकृत नहीं हुए हैं। इससे कर्मचारियों और संसाधनों की संख्या बढ़ाने में अड़चन आ रही है। शहर का दायरा बढ़ने के बावजूद पुराना ढांचा ही सफाई व्यवस्था का आधार बना हुआ है।