जयपुर के गणपति विसर्जन में इस बार आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण और महाराष्ट्र की परंपरा की झलक भी देखने को मिली। कहीं गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन 3 हजार औषधीय पौधों के बीच किया गया, तो कहीं महाराष्ट्र की तर्ज पर भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शहर में अलग-अलग स्थानों पर हुए इन अनूठे आयोजनों ने गणेशोत्सव को खास बना दिया। गणपति महोत्सव के समापन पर शुक्रवार को गणपति विसर्जन के दौरान भक्ति के साथ पर्यावरण संरक्षण और महाराष्ट्र की परंपरा की अनूठी झलक देखने को मिली। टोंक रोड सांगानेर स्थित श्री पिंजरापोल गौशाला के वैदिक औषधीय पादप केंद्र सनराइज ऑर्गेनिक पार्क में धन्वंतरि गणपति का विसर्जन किया गया। वहीं वैशाली नगर में महाराष्ट्र की तर्ज पर निकली गणपति विसर्जन शोभायात्रा ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच चाकसू के मनोहर तालाब तक पहुंची। 3 हजार औषधीय पौधों में समाए गणपति श्री पिंजरापोल गौशाला में आयोजित धन्वंतरि गणपति विसर्जन पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ किया गया। गणपति की प्रतिमा गौमाता के गोबर, उपजाऊ मिट्टी और तुलसी, शतावरी, पीकेएम मोरिंगा व नागौरी अश्वगंधा सहित विभिन्न औषधीय बीजों से तैयार की गई थी। अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता और हैनीमैन एनिमल चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके बाद गणपति की प्रतिमा को शोभायात्रा के रूप में विसर्जन स्थल तक ले जाया गया। शोभायात्रा में गौसेवक, वेदपाठी बटुक और श्रद्धालु ढोल की थाप पर नाचते हुए शामिल हुए। जमीन में बनाए गए अस्थायी तालाब में प्रतिमा का विसर्जन किया गया। खास बात यह रही कि प्रतिमा की मिट्टी मिले पानी को 3 हजार से अधिक औषधीय पौधों की जड़ों में समाहित किया गया। आयोजकों के अनुसार, प्रतिमा प्रकृति में पुन: समाहित होकर औषधीय पौधों के रूप में नया जीवन पाएगी। मोनिका गुप्ता ने कहा कि गणपति को प्रकृति में जीवंत रखने का संकल्प लिया गया है। प्रतिमा की मिट्टी से पनपने वाले औषधीय पौधे आगे स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देंगे। महाराष्ट्र की तर्ज पर 15 साल से गणपति उत्सव वहीं वैशाली नगर में गणपति विसर्जन के दौरान महाराष्ट्र की परंपरा की झलक दिखाई दी। यहां पिछले 15 वर्षों से महाराष्ट्र की तर्ज पर गणपति उत्सव मनाया जा रहा है। इस बार महाराष्ट्र के कारीगरों से तैयार कराई गई करीब साढ़े तीन फीट ऊंची मिट्टी की गणपति प्रतिमा का ढोल-नगाड़ों के साथ विसर्जन किया गया। आयोजक कंवलजीत राणावत के अनुसार विसर्जन यात्रा के लिए महाराष्ट्र से विशेष ढोल-नगाड़ों की टीम बुलाई गई थी। करीब 100 से 150 ढोल वादक शोभायात्रा में शामिल हुए। इसके साथ दक्षिण भारत की पारंपरिक बैंड टीम भी आकर्षण का केंद्र रही। वैशाली नगर से शुरू हुई विसर्जन यात्रा चाकसू स्थित मनोहर तालाब पहुंची, जहां गणपति प्रतिमा का विसर्जन किया गया। यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। आयोजन में श्रद्धालुओं के लिए भोजन-प्रसादी की भी व्यवस्था की गई। इस तरह जयपुर में एक ओर महाराष्ट्र की पारंपरिक भव्यता के साथ गणपति को विदाई दी गई, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण की पहल के तहत गणपति को औषधीय पौधों के रूप में नया जीवन देने का संदेश दिया गया।