राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जसोल के मैदान में बुधवार रात 'एक शाम माजीसा के नाम' 27वीं भव्य भजन संध्या का आयोजन किया गया। भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी के मौके पर हुई इस भजन संध्या में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। श्री माजीसा मित्र मंडल और श्री माजीसा जन सेवा समिति, जसोल ने इसका आयोजन किया था। मां माजीसा के जयकारों और भजनों से देर रात तक पूरा माहौल भक्तिमय बना रहा। कलाकारों ने दी प्रस्तुति भजन संध्या में प्रसिद्ध भजन गायक प्रकाश माली के साथ हेमंत लोढ़ा, लक्ष्मण तंवर, महावीर सांखला, अनिता जांगिड़ और अशोक प्रजापत ने भक्ति रचनाओं की शानदार प्रस्तुतियां दीं। कलाकारों की मधुर प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। श्रद्धालुओं ने देर रात तक भजनों का आनंद लिया और मां माजीसा के जयकारों से आयोजन स्थल गूंजता रहा। इस मौके पर श्री राणी भटियाणी मंदिर संस्थान, जसोल के प्रवक्ता कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मां माजीसा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ रही है। इस साल भजन संध्या में इतनी भीड़ थी कि विद्यालय का मैदान भी छोटा पड़ गया। एक पेड़ मां माजीसा के नाम जुड़ने का आह्लान कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने 'एक पेड़ मां माजीसा के नाम' अभियान से जुड़ने का आह्वान भी किया। उन्होंने बताया कि राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जसोल में करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से नए भवन बनाए जाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि अगले साल इस आयोजन को और बड़ा रूप देने के लिए संस्थान नदी किनारे विकसित रिवर फ्रंट पार्किंग में भजन संध्या करने की कोशिश करेगा। वहां श्रद्धालुओं के बैठने, भजन संध्या और महाप्रसादी के लिए काफी जगह है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले साल रिवर फ्रंट पार्किंग में भक्ति, भजन और महाप्रसादी का सुंदर संगम देखने को मिलेगा। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए भोजन प्रसादी समेत दूसरी व्यवस्थाएं भी बढ़ाई जाएंगी, ताकि हर श्रद्धालु आसानी से इसमें शामिल हो सके। 27 वर्षों की भक्ति परंपरा, विद्यालय में बनेंगे नवीन भवन कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि पिछले 27 वर्षों से श्री माजीसा मित्र मंडल द्वारा इसी विद्यालय परिसर में ‘एक शाम माजीसा के नाम’ भजन संध्या आयोजित की जा रही है। इन 27 वर्षों में इस आयोजन ने माँ माजीसा के प्रति श्रद्धा और भक्ति की सुंदर परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया है। माँ माजीसा की कृपादृष्टि और श्रद्धालुओं के श्रद्धा-सुमन से अब इसी विद्यालय के विकास का नया अध्याय प्रारंभ होने जा रहा है। उन्होंने बताया कि राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जसोल परिसर में लगभग 13 करोड़ रुपये की लागत से नवीन भवनों का निर्माण किया जाएगा। इस महत्वपूर्ण कार्य की घोषणा 15 अगस्त 2026 को संस्थान अध्यक्ष आदरणीय रावल किशन सिंह जसोल के मार्गदर्शन में की गई थी। उन्होंने कहा कि जिस परिसर में 27 वर्षों से माँ माजीसा के नाम की भक्ति धारा प्रवाहित हो रही है, उसी परिसर में शिक्षा के लिए आधुनिक एवं सुव्यवस्थित भवनों का निर्माण होना सुखद संयोग है। नवीन निर्माण से विद्यार्थियों को पर्याप्त एवं सुव्यवस्थित कक्ष, बेहतर बैठने की व्यवस्था, सुरक्षित वातावरण तथा अध्ययन के लिए आवश्यक सुविधाएं मिलेंगी। विद्यालय की आधारभूत सुविधाओं के विस्तार से विद्यार्थियों और शिक्षकों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध होगा। माँ माजीसा की सेवा का अवसर सबसे बड़ा सौभाग्य कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने श्री माजीसा मित्र मंडल, श्री माजीसा जन सेवा समिति एवं आयोजन से जुड़े सेवाभावी कार्यकर्ताओं की सराहना करते हुए कहा कि माँ माजीसा की सेवा का अवसर प्राप्त होना सबसे बड़ा सौभाग्य है। जसोल धाम में मंदिर निर्माण से लेकर वर्तमान में चल रहे विकास एवं सेवा कार्य माँ माजीसा की कृपा और भक्तों के सहयोग से निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनका सौभाग्य है कि उन्हें इस कुल में जन्म मिला और माँ माजीसा के भक्तों की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ। श्रद्धालु माँ माजीसा की भक्ति करें और संस्थान सदैव उनकी सेवा में समर्पित रहे, इसी भाव से कार्य किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की सुविधा और जसोल धाम की व्यवस्थाओं को निरंतर बेहतर बनाना संस्थान की प्राथमिकता है। श्री रावल मल्लीनाथ जी से श्री राणीसा भटियाणीसा तक दिव्य आध्यात्मिक संबंध अपने उद्बोधन में कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने संत शिरोमणि श्री रावल मल्लीनाथ जी, श्री राणी रूपादे जी, श्री राणी चंद्रावल जी एवं श्री राणीसा भटियाणीसा से जुड़े आध्यात्मिक संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि यह गौरवशाली परंपरा सदियों से जनमानस की श्रद्धा और भक्ति में जीवंत है। उन्होंने कहा कि संत शिरोमणि श्री रावल मल्लीनाथ जी उच्च कोटि के संत होने के साथ वीरता, शौर्य और पराक्रम के अद्वितीय प्रतीक रहे। श्री राणी रूपादे जी ने उनके साथ भक्ति, साधना और अध्यात्म के मार्ग को आगे बढ़ाया। दोनों का जीवन मालाणी की संत परंपरा, धार्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत का गौरवशाली अध्याय है। श्री राणी चंद्रावल जी को श्री राणी रूपादे जी का वरदान, श्री राणीसा भटियाणीसा के रूप में अवतार कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि जब श्री रावल मल्लीनाथ जी एवं श्री राणी रूपादे जी अपनी भक्ति और साधना से सशरीर भवसागर पार कर रहे थे, उस समय श्री राणी चंद्रावल जी ने श्री राणी रूपादे जी के समक्ष अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा कि आप अपनी भक्ति और साधना से भवसागर पार हो रहे हैं, अब मेरा क्या होगा? उन्होंने श्री रावल मल्लीनाथ जी एवं श्री राणी रूपादे जी की उच्च कोटि की साधना और आध्यात्मिक सामर्थ्य को पहले पहचान नहीं पाने का भाव भी व्यक्त किया। तब श्री राणी रूपादे जी ने श्री राणी चंद्रावल जी को वरदान दिया कि आपका पुनर्जन्म होगा, इसी कुल में आपका विवाह होगा और कलियुग में आप अवतारी देवी के रूप में पूजी जाएंगी। कलियुग जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, आपका परचा बढ़ता जाएगा तथा आपके प्रति जनमानस की श्रद्धा, भक्ति और आस्था निरंतर व्यापक होती जाएगी। इसी दिव्य क्रम में श्री राणीसा भटियाणीसा को श्री राणी चंद्रावल जी का अवतारी स्वरूप माना जाता है। श्री राणी रूपादे जी के वरदान के अनुरूप उनका पुनर्जन्म हुआ, इसी कुल में उनका विवाह हुआ और कालांतर में श्री राणीसा भटियाणीसा माँ माजीसा के रूप में जन-जन की आराध्य बनीं। आज जसोल धाम से देश-प्रदेश और दूरस्थ क्षेत्रों तक माँ माजीसा के प्रति निरंतर बढ़ रही भक्ति, उनके परचे और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इसी आध्यात्मिक क्रम को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि श्री रावल मल्लीनाथ जी की संत साधना, श्री राणी रूपादे जी की भक्ति एवं आध्यात्मिक चेतना, श्री राणी चंद्रावल जी को प्राप्त वरदान और श्री राणीसा भटियाणीसा का अवतारी स्वरूप एक ही दिव्य आध्यात्मिक धारा के अध्याय हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी जनमानस की श्रद्धा, विश्वास और भक्ति में जीवंत है। संत साधना, वीरता, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक श्री रावल मल्लीनाथ जी कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि श्री रावल मल्लीनाथ जी का विराट व्यक्तित्व संत साधना के साथ वीरता, शौर्य और पराक्रम से सुशोभित था। उन्होंने पांच युद्ध लड़े और पांचों में विजय प्राप्त की। आक्रांताओं के विरुद्ध उनके संघर्ष और विजय ने मालाणी के इतिहास में उनके शौर्य को अमर कर दिया। उनके जीवन में अध्यात्म और वीरता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। संत साधना, निरंकार-निराकार की आराधना, संत समागम, धर्म की रक्षा और मातृभूमि के लिए अदम्य साहस उनके विराट व्यक्तित्व के प्रमुख आयाम रहे। श्री राणी रूपादे जी—भक्ति, साधना और आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक उन्होंने कहा कि श्री राणी रूपादे जी का जीवन भक्ति, साधना और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने श्री रावल मल्लीनाथ जी के साथ अध्यात्म के मार्ग को आगे बढ़ाते हुए संत परंपरा को जनजीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्री रावल मल्लीनाथ जी एवं श्री राणी रूपादे जी का आध्यात्मिक संबंध मालाणी की संत परंपरा के गौरवशाली अध्याय के रूप में आज भी जनमानस में पूजनीय है। तिलवाड़ा की पावन भूमि पर हुआ संत समागम कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि तिलवाड़ा की पावन भूमि श्री रावल मल्लीनाथ जी एवं श्री राणी रूपादे जी की संत साधना और आध्यात्मिक चेतना की साक्षी है। इसी भूमि पर दोनों ने समकालीन संतों का संत समागम करवाया था, जहां संतों और साधकों का संगम हुआ। कालांतर में इसी परंपरा ने राजस्थान के प्राचीन मेलों में शामिल श्री रावल मल्लीनाथ पशु मेले (चैत्री मेले) का स्वरूप लिया। यह मेला प्रतिवर्ष आयोजित होता है और इसकी ख्याति दूर-दूर तक है। आज भी यहां विद्यमान प्राचीन जाल एवं जाल के वृक्षों का समूह उस कालखंड की स्मृतियों को संजोए हुए है। ये प्राचीन वृक्ष तिलवाड़ा की संत परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और मालाणी की सांस्कृतिक चेतना को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ते हैं। निजिया पंथ से प्रकृति तक जुड़ती आध्यात्मिक कड़ी उन्होंने कहा कि श्री रावल मल्लीनाथ जी ने गुरु उगमसी भाटी के सान्निध्य में भादवा की बीज को निजिया पंथ अपनाया। निजिया पंथ में निरंकार और निराकार की आराधना की जाती है। इसी आध्यात्मिक भाव में प्रकृति के प्रति श्रद्धा का विशेष स्थान रहा है। सदियों से चले आ रहे इसी श्रद्धाभाव को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाने और माँ माजीसा के भक्तों की आस्था को प्रकृति संरक्षण से जोड़ने के उद्देश्य से श्री राणी भटियाणी मंदिर संस्थान द्वारा ‘एक पेड़ माँ माजीसा के नाम’ अभियान प्रारंभ किया गया है। ‘एक पेड़ माँ माजीसा के नाम’—13 लाख खेजड़ी के पौधे लगाने का आह्वान कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने बताया कि संस्थान के अध्यक्ष रावल किशन सिंह जसोल के मार्गदर्शन में उनके निज निवास रावलगढ़, जसोल में खेजड़ी का पौधा लगाकर ‘एक पेड़ माँ माजीसा के नाम’ अभियान का शुभारंभ किया गया। श्री रावल मल्लीनाथ जी एवं श्री राणी रूपादे जी की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े प्रकृति के प्रति श्रद्धाभाव और श्री राणीसा भटियाणीसा के प्रति भक्तों की अटूट आस्था को प्रकृति संरक्षण से जोड़ते हुए आगामी एक वर्ष में समस्त भक्तों की सहभागिता से 13 लाख खेजड़ी के पौधे लगाने का आह्वान किया गया है। उन्होंने श्रद्धालुओं, विशेषकर युवा भक्तों से अपने घर, खेत अथवा अन्य उपयुक्त स्थान पर खेजड़ी का पौधा लगाने, उसे माँ के स्वरूप का भाव रखते हुए श्रद्धापूर्वक पूजने और उसकी नियमित देखभाल करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार खेजड़ी का छोटा पौधा समय के साथ बढ़कर विशाल वृक्ष का स्वरूप लेता है, उसी प्रकार माँ माजीसा की कृपा से भक्तों के जीवन में उन्नति हो तथा पौधे के बढ़ने के साथ माँ के प्रति उनकी श्रद्धा, पूजा और भक्ति भी बढ़ती रहे। खेजड़ी में लक्ष्मीजी के निवास की धार्मिक मान्यता का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रत्येक परिवार की सुख-समृद्धि, धन-धान्य और खुशहाली की मंगलकामना के साथ खेजड़ी लगाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अगले वर्ष माँ माजीसा के जन्मोत्सव पर प्रत्येक श्रद्धालु अपने लगाए खेजड़ी के पौधे की पूजा करे, उसके साथ सेल्फी ले और संस्थान के सोशल मीडिया पृष्ठों को टैग करे। इससे अभियान का संदेश अधिक से अधिक भक्तों तक पहुंचेगा और 13 लाख खेजड़ी के पौधे लगाने का आह्वान व्यापक जनभागीदारी का स्वरूप लेगा। 358 वर्ष पुरानी खेजड़ी माँ माजीसा के परचे की साक्षी कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि संस्थान परिसर में विद्यमान प्राचीन खेजड़ी माँ माजीसा के परचे से उत्पन्न हुई थी। लगभग 358 वर्ष पुरानी यह खेजड़ी आज विशाल वृक्ष के रूप में विद्यमान है और माँ माजीसा के परचे, उनकी कृपा एवं भक्तों की सदियों पुरानी आस्था की जीवंत साक्षी है। उन्होंने कहा कि श्री रावल मल्लीनाथ जी एवं श्री राणी रूपादे जी की आध्यात्मिक परंपरा में प्रकृति के प्रति श्रद्धाभाव और जसोल धाम में विद्यमान प्राचीन खेजड़ी आस्था, संस्कृति और प्रकृति के गहरे संबंध को प्रकट करती है। त्रयोदशी पर 13 हजार खेजड़ी के पौधे प्रसाद स्वरूप भेंट उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी के पावन अवसर पर 13 हजार खेजड़ी के पौधे प्रसाद स्वरूप भक्तों को भेंट किए गए। भजन संध्या में भी 50 खेजड़ी के पौधे भेंट कर आयोजकों एवं श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया कि 13 लाख खेजड़ी के पौधे लगाने के आह्वान को जन-जन तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि अभियान के माध्यम से खेजड़ी को घर-घर और खेत-खेत तक पहुंचाने का प्रयास किया जाए तथा अधिक से अधिक भक्तों को पौधरोपण एवं पौधों के संरक्षण से जोड़ने की दिशा में कार्य किया जाए। माँ माजीसा के दरबार में सच्चा भाव सर्वोपरि कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि माँ माजीसा के दरबार में सभी श्रद्धालु समान हैं और माँ के प्रति सच्ची श्रद्धा तथा मन का भाव सर्वोपरि है। श्रद्धालु अपने मन की बात स्वयं माँ माजीसा के समक्ष रखें। प्रसाद अथवा अर्पित सामग्री से अधिक महत्व श्रद्धाभाव का है। उन्होंने कहा कि मंदिर पहुंचकर दर्शन करने वाले श्रद्धालु अपनी प्रार्थना माँ के चरणों में रखें और घर से स्मरण करने वाले श्रद्धालु भी शांत मन एवं सच्चे भाव से माँ का ध्यान करें। सच्चे भाव से की गई प्रार्थना माँ तक अवश्य पहुंचती है, यही सच्ची आस्था है। उन्होंने धार्मिक एवं पारिवारिक परंपराओं, इतिहास और संस्कृति की सही जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर देते हुए कहा कि धार्मिक मंच श्रद्धा, सेवा, धर्म और संस्कृति के केंद्र बने रहें तथा उनकी गरिमा सदैव बनी रहे। अनिता जांगिड़ की उपलब्धि पर तालियों से अभिनंदन भजन संध्या में प्रस्तुति देने पहुंचीं अनिता जांगिड़ की शैक्षणिक उपलब्धि का भी मंच से उल्लेख किया गया। कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने बताया कि अनिता ने बारहवीं कक्षा में 93 प्रतिशत अंक प्राप्त कर उल्लेखनीय उपलब्धि अर्जित की है। उन्होंने शिक्षा के साथ भक्ति संगीत में अपनी प्रतिभा को आगे बढ़ाने की सराहना की। उपस्थित श्रद्धालुओं ने तालियों के साथ उनका अभिनंदन किया। प्रकाश माली से अभियान का संदेश जन-जन तक पहुंचाने का आग्रह कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने प्रसिद्ध भजन गायक प्रकाश माली से ‘एक पेड़ माँ माजीसा के नाम’ अभियान में सक्रिय सहभागिता का आग्रह किया। उन्होंने प्रकाश माली से अपने घर खेजड़ी का पौधा लगाने, उसे माँ माजीसा के स्वरूप का भाव रखते हुए उसकी देखभाल करने, उसके साथ सेल्फी लेकर संस्थान के सोशल मीडिया पृष्ठों को टैग करने और अपनी भजन संध्याओं के माध्यम से खेजड़ी रोपण एवं संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भजन कलाकारों की वाणी से आस्था और प्रकृति संरक्षण का संदेश दूर-दूर तक पहुंचेगा तथा माँ माजीसा के अधिक से अधिक भक्त इस अभियान से जुड़ेंगे। अगले वर्ष 2027 में तिलवाड़ा में श्री रावल मल्लीनाथ जी की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि इस गौरवशाली आध्यात्मिक क्रम को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2017 में श्री राणी रूपादे जी की प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी। अगले वर्ष 2027 में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर तिलवाड़ा में संत शिरोमणि श्री रावल मल्लीनाथ जी के मंदिर की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा होगी। उन्होंने कहा कि तिलवाड़ा में निर्माणाधीन श्री रावल मल्लीनाथ जी का मुख्य मंदिर उनकी संत साधना, आध्यात्मिक चेतना और जनआस्था का प्रतीक बन रहा है। मंदिर के चारों ओर बन रहा विशाल परकोटा उनकी वीरता, शौर्य और पराक्रम को समर्पित है। मंदिर और परकोटा मिलकर श्री रावल मल्लीनाथ जी के संत स्वरूप, धार्मिक चेतना, वीरता और पराक्रम को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएंगे। उन्होंने देश-प्रदेश के श्रद्धालुओं को वर्ष 2027 में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर तिलवाड़ा पहुंचकर इस भव्य आयोजन के साक्षी बनने और सेवा में सहभागिता प्रदान करने का आमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि श्री राणी रूपादे जी की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद श्री रावल मल्लीनाथ जी की प्राण-प्रतिष्ठा इस आध्यात्मिक यात्रा का अगला महत्वपूर्ण अध्याय होगा। इसी क्रम में आने वाले वर्षों में श्री राणीसा भटियाणीसा की ऐतिहासिक एवं भव्य प्राण-प्रतिष्ठा के आयोजन की भावना भी है। श्रद्धालुओं और सेवाभावी कार्यकर्ताओं का जताया आभार कार्यक्रम के अंत में कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने श्री माजीसा मित्र मंडल, श्री माजीसा जन सेवा समिति, भजन कलाकारों, सेवाभावी कार्यकर्ताओं एवं बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने सभी को भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी की शुभकामनाएं देते हुए माँ माजीसा से प्रत्येक परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली की मंगलकामना की। भजन संध्या का क्रम देर रात तक चलता रहा। प्रकाश माली सहित सभी कलाकारों की भक्तिमय प्रस्तुतियों पर श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर रहे। माँ माजीसा के जयकारों, भजनों की स्वर लहरियों और श्रद्धालुओं के उत्साह के बीच ‘एक शाम माजीसा के नाम’ 27वीं भव्य भजन संध्या भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुई।