नगर निगम चुनाव के सभी 80 वार्डों के आधिकारिक परिणाम घोषित हो चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी ने 53 सीटों पर एकतरफा जीत हासिल कर लगातार 7वीं बार नगर निकाय में अपना बोर्ड बनाना तय कर लिया है। चुनाव में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को 23 सीटों से ही संतोष करना पड़ा, जबकि 3 सीटों पर निर्दलीयों और 1 सीट पर सीपीएम ने जीत दर्ज की। दैनिक भास्कर ने 12 सितंबर के अंक में ही आकलन प्रकाशित कर दिया था कि भाजपा 48 से 56 और कांग्रेस 18 से 24 सीटों पर जीत दर्ज करेगी, जो सटीक साबित हुआ। भले ही भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) खाता न खोल सकी हो, लेकिन उसने वार्ड 10 और 12 में भाजपा को सीधी टक्कर देकर दूसरा स्थान हासिल किया। चाय-ऑटो वाले से लेकर डॉक्टर, सीए, पूर्व छात्र नेताओं ने जीतकर और सिद्धार्थ ने हारकर चौंकाया वार्ड 54 से भाजपा के ऑटो ड्राइवर मिथुन दा नाम से मशहूर राजेंद्र गखरेजा ने निर्दलीय देवेंद्र माली को हराया; इनके लिए जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी भी गए थे। शिक्षित चेहरों में पीएचडी धारक कांग्रेस की डॉ. हितांशी शर्मा, डॉ. पूनम राठौड़ और भाजपा की डॉ. कविता जोशी, डॉ. पंकज बोराणा जीते। भाजपा के सीए आशीष कोठारी व कांग्रेस की एमबीबीएस डॉ. खुशी गमेती विजयी रहीं। छात्र राजनीति व युवा संगठनों से प्रमोद सामर, पारस सिंघवी, महेंद्र सिंह शेखावत, डॉ. पंकज बोराणा, किशन भील व हर्षवर्धन केलावत ने बाजी मारी। संगठन नेताओं में भाजपा मंडल अध्यक्ष प्रताप सिंह राठौड़, विजय आहूजा, महेशपुरी गोस्वामी, कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष शंकर चंदेल और पूर्व मेयर प्रत्याशी अरुण टांक भी जीते। वहीं, एनएसयूआई पदाधिकारी सिद्धार्थ सोनी ने वार्ड 14 से चुनाव हारकर चौंका दिया। दिग्गजों के गृह वार्डों का हाल शहर विधायक ताराचंद जैन के गृह वार्ड 34 में भाजपा की अलका गुर्जर ने जीत दर्ज की। हालांकि, ग्रामीण विधायक फूल सिंह मीणा के गृह वार्ड 60 में बड़ा उलटफेर हुआ; यहाँ भाजपा की बागी निर्दलीय खुशबू मेहता (1,852 मत) ने भाजपा की आधिकारिक प्रत्याशी सुषमा को 694 वोटों से शिकस्त दी। इसी तरह वार्ड 61 से निर्दलीय इंदिरा डांगी और वार्ड 11 से निर्दलीय कमलेश बोराणा ने जीत हासिल की। शपथ ग्रहण और बाड़ेबंदी: नतीजों के तुरंत बाद भाजपा के सभी 53 नवनिर्वाचित पार्षदों को कड़ी सुरक्षा के बीच बस से सीधे मतगणना स्थल आरसीए लाया गया। परिजनों से संक्षिप्त मुलाकात के बाद शाम 4 बजे सभी को प्रमाण-पत्र देकर शपथ दिलाई गई। इससे पहले कांग्रेस के 23 पार्षदों ने शपथ ली। पूरे प्रदेश में उदयपुर में भाजपा की सबसे बड़ी जीत, 80 में 53 सीटें यानी 66.25% पर कब्जा राजस्थान के प्रमुख शहरों के निकाय चुनाव परिणामों में उदयपुर में भाजपा का प्रदर्शन सबसे मजबूत रहा। यहां पार्टी ने कुल 80 सीटों में से 53 पर जीत दर्ज की, यानी 66.25% सीटें भाजपा के खाते में गईं। भाजपा की जीत के 4 बड़े कारण दिग्गजों को मैदान में उतारना : विधानसभा चुनाव में दावेदारी करने वाले 7 बड़े चेहरों को पार्षद चुनाव में उतारकर पार्टी ने माहौल अपने पक्ष में मोड़ा।
सीएम का रोड शो व ध्रुवीकरण : मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो ने कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरी। वहीं, खांजीपीर-आयड़ और कन्हैयालाल हत्याकांड के मुद्दों के उठने से मतों का सीधा ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हुआ। सॉलिड कोर वोट बैंक व एकजुटता : टिकट वितरण में कोर वोट बैंक को साधे रखा गया। सीएम ने शहर विधायक, ग्रामीण विधायक और जिलाध्यक्ष के बीच बेहतर तालमेल बिठाए रखा। माइक्रो-मैनेजमेंट : भीतरघात की आशंका के बीच नेताओं ने अपनी-अपनी सीटें बचाने में पूरी ताकत झोंकी, जिससे 100 से कम अंतर वाले 5 नजदीकी मुकाबलों में से अधिकांश भाजपा की झोली में गिरे।
कांग्रेस की हार के 4 बड़े कारण स्टार प्रचारकों की अनुपस्थिति : सीएम भजनलाल के रोड शो की काट के लिए प्रदेश का कोई बड़ा कांग्रेसी चेहरा उदयपुर प्रचार में नहीं उतरा, जिससे कार्यकर्ताओं में असमंजस बना रहा। बड़े चेहरों से दूरी: विधानसभा टिकट के दावेदार बड़े नेताओं को चुनाव मैदान में नहीं उतारा गया, जिससे भाजपा की तुलना में कांग्रेस का प्रचार फीका नजर आया। टिकट वितरण पर असंतोष : 80 में से 20 टिकटों पर भयंकर विरोध हुआ। ऐन वक्त पर 3 प्रत्याशी बदले गए, जिससे संगठन का ढांचा कमजोर हुआ।
केंद्रीय नेतृत्व नहीं : केवल शहर जिलाध्यक्ष और देहात जिलाध्यक्ष ही धरातल पर संघर्ष करते दिखे। अन्य बड़े नेता सिर्फ अपने चहेतों को साधने में जुटे रहे, जिसके चलते 100 से कम अंतर वाली 5 सीटें कांग्रेस के हाथ से फिसल गईं।