सोमवार को नगर निगम के 80 पार्षदों की तस्वीर साफ हो जाएगी। बीकानेर में ट्रिपल इंजन की सरकार बनेगी या कांग्रेस काबिज होगी, या फिर त्रिशंकु बोर्ड में चाबी निर्दलीयों के हाथ रहेगी, यह तय हो जाएगा। चुनाव जीतने का जश्न कुछ घंटों का होगा। असली परीक्षा तिजोरी की चाबी हाथ में लेते ही शुरू होगी। जनता आश्वासनों के बजाय हर महीने वार्डों के विकास का प्रोग्रेस रिपोर्ट कार्ड मांगेगी। नया बोर्ड विकास करेगा या पुरानी देनदारियां चुकाने में उलझ जाएगा, यह आने वाले दिन तय करेंगे। दो साल से प्रशासक काल के दौरान वार्डों की असली तस्वीर निगम के हुक्मरानों तक नहीं पहुंची। वहां बैठकर ऐसे निर्णय लिए गए जिसमें निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों का हित जुड़ा हो। वार्डवार दो साल में कोई टेंडर नहीं हुआ। जहां अफ्सरों और इंजीनियर्स को जहां लगा वहां के टेंडर कर दिए। टेंडर इस तरह से बनाए जिसमें अधिकारियों का हित जुड़ा हो। उदाहरण के तौर पर ट्रांसफर्मर पर लगने वाले टेंडर को दो बार कोर्ट से स्टे मिला मगर अफ्तसर इतने जिद्दी कि एक बार कोर्ट से स्टे के बाद भी नहीं माने। ऐसे में निगम में जनप्रतिनिधियों का हस्तक्षेप होने के बाद हालात बदलेंगे। 2 से 3 करोड़ खर्च कर मेयर बनने वाले दिग्गजों पर रहेगा दबाव करोड़ों रुपए खर्च कर मेयर का ताज पहनने वाले के सामने पैसों की भरपाई और राजनीतिक इनवेस्टमेंट की सोच हावी रहेगी। सोमवार दोपहर 12 बजे तक स्थिति साफ होते ही गुप्त राजनीति शुरू हो जाएगी। स्पष्ट बहुमत (41 से अधिक सीटें) मिलने पर निर्दलीयों की पूछ कम होगी। बहुमत 30 से 32 सीटों पर सिमटने पर निर्दलीयों को मुंहमांगी कीमत चुकानी होगी। दोनों दल संपर्क में हैं, लेकिन रेट तय नहीं हो पा रहे। 2 से 3 करोड़ खर्च कर मेयर बनने वाले दिग्गजों पर रहेगा दबाव करोड़ों रुपए खर्च कर मेयर का ताज पहनने वाले के सामने पैसों की भरपाई और राजनीतिक इनवेस्टमेंट की सोच हावी रहेगी। सोमवार दोपहर 12 बजे तक स्थिति साफ होते ही गुप्त राजनीति शुरू हो जाएगी। स्पष्ट बहुमत (41 से अधिक सीटें) मिलने पर निर्दलीयों की पूछ कम होगी। बहुमत 30 से 32 सीटों पर सिमटने पर निर्दलीयों को मुंहमांगी कीमत चुकानी होगी। दोनों दल संपर्क में हैं, लेकिन रेट तय नहीं हो पा रहे। परिणाम आते ही जीते हुए पार्षदों को तुरंत कड़ी सुरक्षा और गोपनीय ठिकानों पर बाड़ेबंदी में ले जाने की पुख्ता तैयारी है। चर्चा है कि भाजपा ने अपने पार्षदों को सुरक्षित रखने के लिए हरियाणा में जगह बुक करा ली है वहीं कांग्रेस खेमा भी प्रदेश से बाहर जाने के लिए तैयार है और कर्नाटक की ओर रुख कर सकता है। हारने वाले पार्षद तो सीधे अपने घर लौटेंगे। नए बोर्ड के सामने होंगी ये 5 बड़ी चुनौतियां सिटी बसों का घाटा: शहर में चल रहीं 5 सिटी बसों से रोजाना 12,500 रुपए का घाटा। आने को हैं 70 बसें। मनमाने एआरसी टेंडर: पार्षद न होने से अधिकारियों ने 30-30 लाख रुपए तक के मनमाने एआरसी टेंडर किए। भारी देनदारियां और टेंडर: पूर्व-पश्चिम विस क्षेत्र के लिए 90 करोड़ का टिपर-ट्रैक्टर टेंडर हुआ है। ठेकेदारों के 7-8 करोड़, करोड़ों के बिजली बिल और अमृत-2 योजना की 20% हिस्सेदारी के लिए लोन लेना पड़ा है। यूडी टैक्स का पैसा भी इसमें खपेगा। सरकारी शिविरों का बोझ: अभियानों और शिविरों के टेंट-व्यवस्था का पूरा खर्च निगम उठाता है। निगम अब तक करीब ढाई करोड़ फूंक चुका है। इसका सरकार से कोई भुगतान नहीं मिलता और काम एक ही फर्म को जाता है। मेयर और पार्षदों के मानदेय का भार: पार्षद को 5,000 रुपए प्रति माह और मेयर को 20,000 रुपए मानदेय मिलता है। 79 पार्षदों और मेयर के मानदेय का सालाना भार 49 लाख 80 हजार रुपए है। इसके अलावा मेयर की गाड़ी और अन्य खर्चे हैं।