नगर निगम चुनाव परिणाम का सीन सोमवार दोपहर साफ होते ही भाजपा में मेयर कुर्सी की जंग शुरू हो गई। पार्टी में मेयर के नाम को लेकर लॉबिंग तेज हो गई है। चुनाव परिणाम आने से पहले ही जिन नामों की चर्चा थी, उनमें अब जीतकर आए चेहरे सबसे आगे हैं। जयपुर से लेकर दिल्ली तक संपर्क साधे जा रहे हैं और संगठन से लेकर समाज तक की लॉबियां सक्रिय हो गई हैं। खास बात यह है कि अब तक मेयर के लिए वैश्य समाज ही दावा कर रहा था, लेकिन अब ब्राह्मण समाज ने भी लॉबिंग शुरू कर दी है, क्योंकि वैश्य व जैन समाज से तीन मेयर रह चुके हैं, जबकि ब्राह्मण समाज से भाजपा ने अब तक एक बार भी मेयर नहीं बनाया। राजपूत समाज से भी कोई मेयर नहीं मिला। यूजीसी को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी राजपूत समाज में ही है। हालांकि चार वार्डों में री-पोलिंग होने से फिलहाल मेयर का चुनाव टाल दिया गया है। सबसे ज्यादा चर्चा वार्ड-112 से जीते सुनील कोठारी की है पूर्व भाजपा शहर अध्यक्ष और संगठन में कई जिम्मेदारियां संभाल चुके कोठारी को चुनाव से पहले ही मेयर पद का मजबूत चेहरा माना जा रहा था। इन्हें संभावित दावेदारों में सबसे आगे बताया था। दूसरा बड़ा नाम वार्ड-76 से जीते पूर्व डिप्टी मेयर पुनीत कर्णावट का है। कर्णावट के पास निगम चलाने का पिछला अनुभव है। वैश्य चेहरे कई, समाज का दावा मजबूत भाजपा में वैश्य समाज से कई मजबूत चेहरे जीतकर आए हैं। वार्ड-98 के सुभाष सिंघी, वार्ड-135 के विमल अग्रवाल और वार्ड-121 के नीरज अग्रवाल भी मेयर की संभावित सूची में चर्चा में हैं। भाजपा की सूची जारी होने के समय भी विमल अग्रवाल और अन्य वैश्य नेताओं की मौजूदगी को मेयर पद के सामाजिक समीकरण से जोड़कर देखा गया था। वैश्य समाज का दूसरा चेहरा वार्ड-98 से जीते सुभाष सिंघी हैं। इन्होंने कांग्रेस के राजकुमार को 400 वोटों से हराया है। पहली बार राजपूत समाज की दावेदारी विद्याधर नगर के वार्ड-14 से जीते दिग्विजय सिंह को भी दावेदार माना जा रहा है। इनकी पत्नी दुर्गेश नंदनी भी दो बार पार्षद रह चुकी हैं। ब्राह्मण दावेदारी का दबाव ब्राह्मण समाज से पूर्व जयपुर शहर अध्यक्ष शैलेंद्र भार्गव का नाम प्रमुख है। वे वार्ड-43 से जीतकर आए हैं। भाजपा ने उन्हें महत्वपूर्ण पुराने राजनीतिक क्षेत्र से मैदान उतारा था। ब्राह्मण समाज से सिर्फ विष्णु लाटा ही उलटफेर में मेयर बने थे, जो 11 महीने तक मेयर रहे। इस बार फैसला सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं जयपुर में खंडेलवाल समाज से मोहनलाल गुप्ता, जैन समाज से निर्मल नाहटा और माहेश्वरी समाज से अशोक लाहोटी मेयर रह चुके हैं, इसलिए इस बार ब्राह्मण समाज की दावेदारी को भी पार्टी के भीतर वजन मिल रहा है। लेकिन अंतिम फैसला केवल जातीय समीकरण से नहीं होगा। किसके साथ कितने पार्षद हैं, संगठन में पकड़ कितनी है, सरकार और प्रदेश नेतृत्व किसके साथ है और दिल्ली की पसंद क्या है... ये सभी समीकरण निर्णायक होंगे।