मेवाड़ के कृष्ण धाम श्री सांवलिया सेठ मंदिर में खोली गई भंडार दानपेटी की काउंटिंग जारी है। भंडार की काउंटिंग के दूसरे राउंड में 5 करोड़ 94 लाख 35 हजार रुपयों की काउंटिंग हुई है। इससे पहले पहले राउंड की काउंटिंग में 9 करोड़ 35 लाख 65 हजार 100 रुपयों की गिनती हुई है। अब तक दो राउंड की काउंटिंग पूरी होने के बाद श्री सांवलिया सेठ के भंडार से कुल 15 करोड़ 30 लाख 100 रुपए की दान राशि मिल चुकी है। अभी भंडार में आई बाकी राशि की काउंटिंग होना बाकी है। तीसरे राउंड की काउंटिंग 13 अक्टूबर को की जाएगी, जिसके बाद दान राशि का अंतिम आंकड़ा सामने आएगा। 9 अक्टूबर को खोली गई थी भंडार दानपेटी श्री सांवलिया सेठ मंदिर की भंडार दानपेटी 9 अक्टूबर को आश्विन मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन खोली गई थी। भंडार खोलने के बाद मंदिर प्रशासन की ओर से काउंटिंग की प्रक्रिया शुरू की गई। मंदिर परिसर में कर्मचारियों और अधिकारियों की मौजूदगी में दान राशि को अलग-अलग राउंड में गिना जा रहा है। हर राउंड में मिली राशि का रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है। पहले राउंड में नोटों की गिनती पूरी होने के बाद 9 करोड़ 35 लाख 65 हजार 100 रुपए की राशि मिली थी। इसके बाद दूसरे राउंड में भी करोड़ों रुपए की दान राशि सामने आई। दूसरे राउंड में भी करोड़ों रुपए का चढ़ावा मिला दूसरे राउंड की काउंटिंग में 5 करोड़ 94 लाख 35 हजार रुपए की राशि मिली है। इसके साथ ही दो राउंड में मिली राशि का आंकड़ा 15 करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था के कारण हर बार भंडार में बड़ी संख्या में दान राशि आती है। इस बार भी भंडार खुलने के बाद लगातार चल रही काउंटिंग में करोड़ों रुपए की राशि मिल रही है। मंदिर प्रशासन की ओर से पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जा रहा है। तीसरे राउंड के बाद साफ होगा पूरा आंकड़ा भंडार की काउंटिंग अभी पूरी नहीं हुई है। मंगलवार को तीसरे राउंड की काउंटिंग होगी। श्री सांवलिया सेठ मंदिर मेवाड़ ही नहीं बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां राजस्थान के अलावा दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं और श्रद्धानुसार दान करते हैं। ग्राफिक में समझिए सांवलिया सेठ मंदिर का इतिहास चबूतरे पर होती थी मूर्तियों की पूजा 40 साल तक बागुंड के प्राकट्य स्थल पर ही एक चबूतरे पर तीनों मूर्तियों की पूजा की जाती रही। इसके बाद फिर भादसोड़ा के ग्रामीण एक मूर्ति को अपने गांव ले आए और एक केलुपोश मकान में स्थापित कर दिया। वहीं, एक मूर्ति मंडफिया लाई गई थी। तंवर बताते हैं- इन्हीं मूर्तियों में से एक मूर्ति के सीने पर पैर का निशान था। मान्यता है कि यह भृगु ऋषि के पैर हैं। अब पढ़िए- भृगु ऋषि से जुड़ी मान्यता इस मूर्ति पर जो चरण चिन्ह है, उसके पीछे एक कथा है। कथा के अनुसार, एक बार सभी ऋषियों ने मिलकर एक यज्ञ किया। विचार किया कि इस यज्ञ का फल ब्रह्मा, विष्णु या महेश, इनमें से किसे दिया जाए। निर्णय के लिए भृगु ऋषि को चुना गया। वे सबसे पहले भगवान विष्णु के पास पहुंचे, जो उस समय निंद्रा में थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। भृगु ऋषि को यह लगा कि भगवान विष्णु उन्हें देखकर भी सोने का बहाना कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु के सीने पर लात मार दी। भगवान तुरंत उठे और ऋषि के पैर पकड़ लिए, क्षमा मांगते हुए बोले– मेरा शरीर कठोर है, कहीं आपके कोमल चरणों को चोट तो नहीं आई? भगवान की यह विनम्रता और सहनशीलता देखकर भृगु ऋषि ने उन्हें त्रिदेवों में श्रेष्ठ माना और यज्ञ का फल उन्हें ही समर्पित किया।