मेयर चुनाव में क्रॉस वोटिंग का गणित अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है। वो इसलिए क्योंकि मतदान से पहले भाजपा ने ही एक ऐसी चाल खेली थी, जिससे ये तो पता लग रहा कि निर्दलीय और पार्टी से उसे कितने वोट मिले। सूत्रों के मुताबिक भाजपा ने इसमें मुहर लगाने की स्टाइल पहले ही तय की थी। निर्दलीय पार्षदों को कहा था कि उन्हें कमल के चुनाव चिन्ह के पास मोहर लगानी है। भाजपा ने 8 निर्दलीयों के साथ होने का दावा किया था। सात मतपत्रों पर ऐसी जगह मुहर लगी दिखी, जहां बताई गई थी। यानी भाजपा के हाथ से एक निर्दलीय खिसक गया। पार्टी के पार्षदों को चुनाव चिन्ह के नीचे मुहर लगाने को बोला गया था। इस जगह भाजपा को 15 से 17 के आसपास ही मुहर लगी मिली। यानी यहाँ 11 से 13 के आसपास क्रॉस वोटिंग की बात कही जा रही है। भाजपा ने कांग्रेस से करीब 9 से 13 पार्षदों से क्रॉस वोट कराने का प्लान किया था। कांग्रेसी पार्षदों को नाम के पास कमल चुनाव चिन्ह के बाईं तरफ मुहर लगाने के लिए कहा गया था और यहाँ भाजपा को 6 से 7 वोट ही बताए जा रहे हैं। यानी यह बात तय है कि भले ही कांग्रेस 50 वोट लेकर खुश हो रही हो, मगर उसके बाड़े में भाजपा ने सेंध तो लगाई है। फर्क यह रहा कि जो भाजपा कांग्रेस में सेंध लगाने की तैयारी में थी, उसके खुद के घर में बड़ी सेंधमारी हो गई, जिसका उन्हें अंदाजा नहीं था। सूत्र बताते हैं कि भाजपा में तीन से चार पार्षदों में सेंध की गुंजाइश थी, मगर इससे तीन गुना ज्यादा क्रॉस वोटिंग हो गई। इससे भाजपा के पैरों तले जमीन खिसक गई। बलि का बकरा कौन बनेगा, प्रभारियों की कारगुजारियों पर कौन लेगा एक्शन निकाय चुनाव में प्रशासन से लेकर पूरी सरकार ने यहां मेयर बनाने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगाया। मगर भाजपा को शिकस्त मिली। सूत्र बताते हैं कि अब पार्टी के भीतर बड़े ऑपरेशन की तैयारी है। सबसे पहले पार्टी की नैतिक हार की जिम्मेवारी कौन लेगा, ये सवाल बना हुआ है। वैसे इसमें सबसे ऊपर नाम जिलाध्यक्ष का आता है। मगर पार्टी को ये भी पता है कि अध्यक्ष के कहने से कोई टिकट तय नहीं किया गया। टिकट वितरण में अध्यक्ष को जहां साइन करने के लिए कहा गया, वहीं हुए। ऐसे में फिर जिम्मेवारी किसकी है। क्योंकि विधायकों के खिलाफ कोई सीधी कार्रवाई हो नहीं सकती। इसके लिए पार्टी को 2028 तक का इंतजार करना होगा। बीकानेर में हार के लिए स्थानीय नेताओं से पहले उंगलियां प्रभारियों पर उठ रही हैं। प्रभारियों ने जिताऊ उम्मीदवार ना देखकर खुद शहर में गुटबाजी के हिसाब से जयपुर में टिकटों की पैरवी की। वार्ड 75 का टिकट एनवक्त पर कटवाने में एक प्रभारी और एक पार्षद उम्मीदवार की भूमिका बताई जा रही है। क्योंकि वो पार्षद प्रत्याशी खुद मेयर बनने की फिराक में थे और महावीर रांका को रास्ते से हटाना चाहते थे। संबंधित प्रभारी उस उम्मीदवार के प्रभाव में थे और स्थानीय विधायकों का सहारा लेकर एेन वक्त पर रांका का टिकट कटवा दिया। यहीं से भाजपा की हार की शुरुआत हुई। एक प्रभारी की शह पर 16 सामान्य सीटों पर ओबीसी उतारे गए। जिसमें से 10 पर भाजपा हार गई। जबकि कुछ एजेंसियों के सर्वे में अगर सामान्य सीट पर सामान्य प्रत्याशी उतारे जाते तो 16 में से 9 सीटें भाजपा जीतने की स्थिति में थी। मेयर पद के संभावित प्रत्याशी एक-दूसरे को हराने में लगे थे और भाजपा बाकी की चिंता छोड़ सिर्फ एक वार्ड को जिताने में लगी रही। जयपुर मुख्यालय से जुड़े एक भाजपा नेता ने नाम ना छापने की शर्त पर कहा िक मिथिलेश गौतम इस पूरे प्रकरण में क्यों चुप रहे और जो गलत हो रहा था उस पर क्यों नहीं बोले ये समझ नहीं आया। प्रदेश के ही दूसरे प्रदेश महामंत्री का पूरा फोकस बीकानेर पर था क्योंकि वे परिसीमन के बाद यहां अपनी जमीन तलाशने के लिए नींव बिछा रहे थे। सामान्य सीटों पर इसीिलए ओबीसी वर्ग के टिकट दिए गए।