वन विभाग का अजब सिस्टम सामने आया है। एक ओर तस्करों के पास हाईटेक गाड़ियां हैं और फील्ड में तैनात अधिकारियों-कर्मचारियों को गश्त के लिए साधन तक उपलब्ध नहीं हो रहे, वहीं दूसरी ओर विभाग बंद हो चुके प्रोजेक्ट्स की 6 गाड़ियां मुख्यालय के वाहन पूल में जमा कराने में जुटा है। दो साल के भीतर यह दूसरा मौका है, जब फील्ड की जरूरत को नजरअंदाज कर गाड़ियां वापस जयपुर खींची जा रही हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि बिना गाड़ियों के वनकर्मी हाईटेक तस्करों का मुकाबला कैसे करेंगे? प्रधान मुख्य वन संरक्षक (प्रशासन) पवन कुमार उपाध्याय ने अजमेर, जोधपुर, उदयपुर और जयपुर के सीसीएफ को पत्र भेजकर इन गाड़ियों को सर्वोच्च प्राथमिकता से जयपुर मंगाने के निर्देश दिए हैं। 734 वर्ग किमी जंगल, वाहन 1, निगरानी कैसे? विभाग टोंक, भीलवाड़ा, सोजत, बेगूं, बांसवाड़ा और आबूरोड के मर्ज हो चुके प्रोजेक्ट कार्यालयों से गाड़ियां वापस ले रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि बंद प्रोजेक्ट की गाड़ियों को जयपुर बुलाने के बजाय उन वन मंडलों को क्यों नहीं दिया जा रहा, जो लंबे समय से वाहनों की किल्लत झेल रहे हैं? दो साल पहले भी हुआ था ऐसा ही खेल दो साल पहले विभाग ने जिलों में 50 नई स्कॉर्पियो-एन और फ्लाइंग के लिए 4 बाय 4 गाड़ियां बांटी थीं। पुरानी बोलेरो रेंजों को सौंपी गई थीं। एक माह बाद ही 9 गाड़ियां जयपुर मंगा ली गईं। खास बात यह है कि जिन वन मंडलों में डीएफओ राजस्थान वन सेवा के अधिकारी थे, वहां से गाड़ियां छीन ली, जबकि आईएफएस वाले मंडलों से गाड़ियां नहीं ली गईं। ट्रांसफर से पहले ही गाड़ियों पर कब्जा वन बल प्रमुख अरिजित बनर्जी ने 9 सितंबर को आदेश जारी कर बंद हुए प्रोजेक्ट्स की संपत्तियां 24 सितंबर तक स्थानीय वन मंडलों को सौंपने को कहा था। लेकिन उससे पहले ही 18 अगस्त को प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने गाड़ियों को सीधे जयपुर मंगाने के आदेश निकाल दिए। मामले को लेकर उपाध्याय से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया।