चित्तौड़गढ़ पंचायत समिति में तीन दशक में ग्राम पंचायतों की संख्या 39 से बढ़कर 53 हो गई है। 1994 में जहां 39 ग्राम पंचायतें थीं, वहीं 2019 में संख्या 40 हुई और परिसीमन के बाद 2026 में 13 नई पंचायतें जुड़ने से यह आंकड़ा 53 पहुंच गया। इसी के साथ सरपंच पदों के आरक्षण का स्वरूप भी बदला है। इस बार 26 ग्राम पंचायतों में महिला सरपंच होंगी, जबकि 9 सीटें एससी, 7 एसटी, 10 ओबीसी और 27 अनारक्षित वर्ग के लिए तय हुई हैं। यानी पंचायतों की बढ़ती संख्या के साथ गांवों में नेतृत्व और चुनावी समीकरण भी बदले हैं। नई पंचायतों ने बदल दिया गांवों का राजनीतिक नक्शा परिसीमन के बाद बनी नई ग्राम पंचायतों में आछोड़ा, बल्दरखां, बावड़ीखेड़ा, बोजुन्दा, डगलां का खेड़ा, दौलतपुरा, गणेशपुरा, लालजी का खेड़ा, पुरोहितों का सांवता, सिन्दवड़ी, सिरोड़ी, सोकिया और ठीकरिया शामिल हैं। इन पंचायतों के गठन से कई गांवों की सीमाएं बदली हैं। इसका सबसे बड़ा असर स्थानीय नेताओं पर पड़ेगा। पहले जो नेता एक बड़ी पंचायत में चुनाव लड़ते थे, अब उन्हें नए क्षेत्र और नए मतदाताओं के बीच अपनी पहचान बनानी होगी। कई जगह पुराने समीकरण टूटेंगे तो कई जगह पहली बार नए चेहरे सरपंच बनने का मौका पाएंगे। यही वजह है कि इस बार पंचायत चुनाव में परिसीमन सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा माना जा रहा है। महिला नेतृत्व पहले से कहीं ज्यादा मजबूत पिछले 32 साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो पंचायत चुनाव में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। साल 1994, 1999 और 2004 में सिर्फ 13 ग्राम पंचायतों में महिला सरपंच चुनी जाती थीं। साल 2009 में यह संख्या बढ़कर 21 हो गई। साल 2014 में 19 और 2019 में 20 महिला सीटें रहीं। अब 2026 में 53 ग्राम पंचायतों में से 26 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। यानी लगभग आधी पंचायतों का नेतृत्व महिलाओं के हाथ में होगा। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ चुनावों में महिला सरपंचों की सक्रिय भूमिका बढ़ी है और अब गांवों की राजनीति में उनका प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा दिखाई देने लगा है। आरक्षण का गणित भी समय के साथ बदला सरपंच पदों का आरक्षण भी हर चुनाव के साथ बदलता रहा है। साल 1994, 1999 और 2004 के चुनाव साल 1991 की जनगणना के आधार पर हुए थे। साल 2009 में पहली बार साल 2001 की जनगणना के अनुसार आरक्षण तय किया गया। इसके बाद 2014, 2019 और अब 2026 में साल 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का आरक्षण किया गया है। इस बार अनुसूचित जाति के लिए 9, अनुसूचित जनजाति के लिए 7, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 10 और 27 पद अनारक्षित रखे गए हैं। महिलाओं के लिए कुल 26 सीटें आरक्षित हैं। जनसंख्या और पंचायतों की संख्या बढ़ने के साथ आरक्षण का स्वरूप भी बदलता गया है। चुनाव की राजनीति अब नए दौर में इस बार का पंचायत चुनाव पिछले चुनावों से कई मायनों में अलग रहेगा। एक तरफ नई ग्राम पंचायतें बनी हैं, दूसरी तरफ कई पंचायतों का आरक्षण बदल गया है। ऐसे में पुराने सरपंचों और दावेदारों को नई रणनीति बनानी होगी। कई पंचायतों में पहली बार नए परिवारों और नए चेहरों को मौका मिलेगा। राजनीतिक दल भले पंचायत चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं लड़ते, लेकिन गांवों में उनके समर्थित उम्मीदवारों के बीच मुकाबला रहता है। ऐसे में परिसीमन, बढ़ी पंचायतें और बदला आरक्षण इस चुनाव के प्रमुख राजनीतिक फैक्टर बनकर सामने आए हैं। आने वाले दिनों में नामांकन के साथ इन बदलावों का असर गांव-गांव की चुनावी तस्वीर में साफ दिखाई देगा।