शहर में दंग की नसिया में आचार्य वर्धमान सागर का चातुर्मास जारी है। आचार्य ने सोमवार को प्रवचनों में कहा कि आत्मा शरीर-रूपी वाहन पर चारों गतियों में परिभ्रमण यात्रा कर रही है। नदी दो तट-किनारों के बीच बहती है। नदी अनियंत्रित होने पर किनारा तोड़कर सर्वनाश करती है। मनुष्य जीवन में पांच इन्द्रियों का संयम महत्वपूर्ण है। विषय भी विष है। संयम रत्न है। विषय-भोग चोर हैं। इसकी रक्षा धर्म से की जाती है। डॉ. राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि संयम आंतरिक शक्तियों को विकसित करता है। जिस प्रकार वाहन को ब्रेक से नियंत्रित किया जाता है। उसी प्रकार नदी को तट से नियंत्रित किया जाता है। उसी प्रकार आत्मा-शरीर को भी संयम-रूपी ब्रेक से नियंत्रित किया जाता है। आचार्य श्री ने प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी के संघपति का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि संघपति जवेरी परिवार ने यात्रा कराने के बाद मुनि दीक्षा ली। एक साधु और एक श्राविका एक माह में 32 उपवास कर रहे हैं। अन्य साधु, श्रावक, श्राविकाएं दशलक्षण के 10 उपवास सीकर में कर रहे हैं। उनसे आपको भी छोटे-छोटे नियम लेने की प्रेरणा लेनी चाहिए। आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व आर्यिका श्री देशना मति जी के उपदेश हुए। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र में आचार्य श्री ने 8 कर्मों की विवेचना की। नगर के जिनालयों में अष्ट कर्म-नाश के लिए सुगंध दशमी पर्व पर दिगंबर समाज ने अग्नि पर धूप क्षेपण किया। रात्रि को महाआरती में हजारों श्रद्धालु जुलूस के माध्यम से शामिल होते हैं। उसके बाद सांस्कृतिक प्रतियोगिता होती है।