नगर निगम चुनाव के बाद अब शहर की सियासत और नगर निगम के सदन की तस्वीर पूरी तरह से साफ हो चुकी है। नवनिर्वाचित पार्षदों की सूची और उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के आंकड़े यह बताते हैं कि इस बार का नगर निगम बोर्ड पिछले बोर्डों से काफी अलग और दिलचस्प होने वाला है। शहर की जनता ने पुराने और स्थापित राजनीतिक चेहरों पर भरोसा जताने के साथ-साथ बड़ी संख्या में नए और युवा नेतृत्व को भी निगम की दहलीज तक पहुंचाया है। नगर निगम के कुल 80 वार्डों में से 52 पार्षद (यानी करीब 65%) ऐसे हैं जो पहली बार पार्षद चुनकर आए हैं। इन नए पार्षदों में से एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो सीधे तौर पर भले ही पहली बार चुनाव जीता हो लेकिन उनके घरों में राजनीति की पुरानी पैठ रही है। सूची पर नजर डालें तो कई ऐसे नए पार्षद हैं जिनके परिवार में पूर्व में उनकी माता, पिता, पति या पत्नी पार्षद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। 28 पार्षद (यानी करीब 35%) अनुभवी श्रेणी में आते हैं। ये वो चेहरे हैं जो लगातार दूसरी, तीसरी या चौथी बार जनता का विश्वास जीतकर सदन में पहुंचे हैं। निगम की कार्यप्रणाली, बजट आवंटन, और वार्ड के विकास कार्यों की प्रशासनिक पेचीदगियों से वाकिफ हैं। इनमें कुछ ऐसे दिग्गज भी हैं जो अपनी राजनीतिक सक्रियता और जनसंपर्क के दम पर चौथी बार सदन तक का सफर तय करने में कामयाब रहे हैं। आरक्षण व्यवस्था के कारण अब ज्यादातर नए पार्षद ज्यादा आते हैं ​क्योंकि हर बार वार्ड का आरक्षण बदल जाता है। मेयर और कमिश्नर को अगर निमयों की जानकारी हो तो सदन चलाया जा सकता है। पर नए-पुराने से फर्क नहीं पड़ता। हां, नेता प्रतिपक्ष मजबूत हो तो सदन में मुकाबला देखने को मिल सकता है। -नारायण चोपड़ा, एडवोकेट व पूर्व मेयर असर: सदन की बैठकों में औपचारिकता कम, ज्यादा गूंजेंगे तीखे सवाल : नवनिर्वाचित बोर्ड के इस अनूठे स्वरूप का सीधा असर आने वाले समय में नगर निगम की आम बैठकों और शहर के विकास कार्यों पर पड़ना तय है। सदन में 65% नए पार्षदों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि इस बार की बैठकों में पुरानी राजनीतिक औपचारिकताएं कम और तीखे सवाल ज्यादा गूंजेंगे। हालांकि नए पार्षदों की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन 35% अनुभवी पार्षदों का होना सदन के संतुलन के लिए बेहद जरूरी है। निगम के नियमों, उपनियमों और बैठकों के संचालन के दौरान यही अनुभवी चेहरे नए पार्षदों का मार्गदर्शन करते नजर आएंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अनुभव की कमी और जनता की उम्मीदों के भारी दबाव के चलते नए पार्षद कई बार सदन में आक्रामक रुख अपना सकते हैं। ऐसे में विकास कार्यों, वार्डों की समस्याओं और प्रशासनिक अधिकारियों की सुस्ती को लेकर इस बार निगम की बैठकों में जोरदार हंगामा होने की पूरी संभावना है। कुल मिलाकर नगर निगम का यह नया बोर्ड जोश और अनुभव के दो अलग छोरों पर खड़ा है। जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए जहां नए पार्षदों को अपनी ऊर्जा दिखानी होगी वहीं शहर के विकास को गति देने के लिए अनुभवी पार्षदों की सूझबूझ का भी पूरा सहारा लेना होगा। ता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए नए पार्षदों को अनुभवी दिग्गजों की रणनीति का साथ लेना होगा।