स्वर्णनगरी के निकाय रण में मतदान संपन्न होने के बाद अब शह और मात का खेल चौपालों से निकलकर नेताओं के चुनावी दफ्तरों तक पहुंच गया है। मतदान के दिन मतदाताओं की साधी गई चुप्पी ने भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही खेमों की धड़कनें तेज कर दी हैं। शहर के राजनीतिक गलियारों और चौराहों पर जारी चर्चाओं का लब्बोलुआब यही है कि इस बार किसी भी दल की राह आसान नहीं दिख रही। स्पष्ट बहुमत का जादुई आंकड़ा छूना दोनों ही दलों के लिए टेढ़ी खीर साबित होता नजर आ रहा है। परिणामों से पहले उपजे इस संशय के बीच दोनों दलों के शीर्ष रणनीतिकारों ने एक-एक वार्ड का सूक्ष्म आकलन शुरू कर दिया है। संबंधित वार्डों के पोलिंग एजेंटों और प्रमुख कार्यकर्ताओं को बुलाकर बूथवार मतदान प्रतिशत और वोटरों के मिजाज का पता लगाया जा रहा है। भले ही सार्वजनिक मंचों से दोनों दल पूर्ण बहुमत से बोर्ड बनाने का दम भर रहे हों, लेकिन अंदरखाने दबी जुबान से कद्दावर नेता भी स्वीकार कर रहे हैं कि मुकाबला उम्मीद से कहीं ज्यादा कड़ा और अप्रत्याशित हो चुका है। यदि मतदान के बाद उभरे ये समीकरण नतीजों में तब्दील होते हैं, तो जैसलमेर नगर परिषद में बोर्ड गठन की चाबी पूरी तरह से निर्दलीयों और बागियों के हाथ में आ जाएगी। 12 सीटों की सीधी टक्कर और 10 सीटों पर निर्दलीयों के प्रभाव के चलते कोई भी दल अपने दम पर जादुई आंकड़ा पार करता नहीं दिख रहा। ऐसे में बाड़ाबंदी, निर्दलीयों को साधने की जोड़-तोड़ शुरू हो गई है। इस पूरे चुनाव का सबसे रोचक और निर्णायक पहलू निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी है। कुल 10 वार्ड ऐसे हैं, जहां निर्दलीय उम्मीदवार सीधे तौर पर भाजपा या कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन 10 में से कम से कम 5 से 6 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी बाजी भी मार सकते हैं। वहीं शेष वार्डों में वे किसी एक दल का परंपरागत गणित बिगाड़कर दूसरे को वॉकओवर जैसी स्थिति में पहुंचा रहे हैं। वोटिंग ट्रेंड के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार शहर के 12 वार्ड ऐसे हैं, जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच बेहद नजदीकी मुकाबला है। इन वार्डों में वोटों का ध्रुवीकरण इस कदर हुआ है कि जीत-हार का अंतर बहुत कम रहने की संभावना है। वार्ड संख्या 1, 6, 7, 10, 13, 21, 22, 26, 33, 41, 42 और 43 में ज्यादा रोचक मुकाबला है। इसके अलावा भी कुछ वार्डों में टक्कर देखी जा सकती है। इन क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों, व्यक्तिगत रसूख, मतदान के अंतिम घंटों में हुए ध्रुवीकरण ने मुकाबले को फंसा दिया है। दोनों ही दल यहां अपनी जीत पक्की मान रहे हैं। मार्जिन इतना कम रहने के आसार हैं कि किसी भी तरफ पासा पलट सकता है।