जयपुर के बॉम्बे हॉस्पिटल की सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सौम्यता सोमेंद्र शर्मा ने एक सेमिनार में सेंट्रल वेनोप्लास्टी और स्टेंटिंग उपचार की तकनीक की जानकारी दी। उन्होंने कहा- चेहरे, गर्दन या हाथों में अचानक तेज सूजन के साथ सांस लेने में परेशानी हो तो इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार इसके पीछे शरीर की बड़ी नसों में खून का थक्का जमना या नस का गंभीर रूप से बंद होना हो सकता है। ऐसी स्थिति में रक्त का प्रवाह बाधित होने से मरीज की परेशानी तेजी से बढ़ सकती है। ऐसे जटिल मामलों में सेंट्रल वेनोप्लास्टी और स्टेंटिंग उपचार की एक ऐसी तकनीक के रूप में सामने आई है, जिसमें बड़ी सर्जरी किए बिना कैथेटर की मदद से बंद नस को खोला जाता है। मरीज में सही समय पर की गई इस प्रक्रिया से कुछ ही घंटों में रक्त का प्रवाह बेहतर होने के साथ सूजन और सांस लेने में परेशानी में भी राहत मिल सकती है। उन्होंने बताया- यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन मरीजों में महत्वपूर्ण हो सकती है, जिनमें सामान्य तरीके से खून का थक्का गलाने वाली दवा देना अधिक जोखिम के कारण सुरक्षित नहीं होता। शरीर की बड़ी नस बंद होने पर क्या होता है? शरीर से खून को वापस हृदय तक पहुंचाने वाली कुछ बड़ी नसें होती हैं। इनमें सुपीरियर वेना कावा, इनोमिनेट वेन और इंटरनल जुगुलर वेन प्रमुख हैं। इनमें रुकावट आने पर शरीर के ऊपरी हिस्से से खून का सामान्य प्रवाह प्रभावित हो जाता है। इसका असर सबसे पहले चेहरे, गर्दन और हाथों पर दिखाई दे सकता है। इन हिस्सों में अचानक या लगातार सूजन आने लगती है। कुछ मरीजों में सांस लेने में परेशानी, भारीपन और बेचैनी भी बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति कैंसर, लंबे समय से डायलिसिस करा रहे किडनी रोगियों, गंभीर संक्रमण या अन्य जटिल बीमारियों से जूझ रहे मरीजों में देखने को मिल सकती है। कैसे काम करती है यह तकनीक? डॉ सौम्यता सोमेंद्र शर्मा ने कहा कि सेंट्रल वेनोप्लास्टी को आसान भाषा में समझें तो इसमें डॉक्टर शरीर की नस में एक पतली नली यानी कैथेटर डालकर उसे उस स्थान तक ले जाते हैं, जहां नस बंद या बहुत संकरी हो गई है। इसके बाद एक छोटे बैलून की मदद से बंद नस को फैलाया जाता है। यदि नस दोबारा बंद होने का खतरा हो या रुकावट ज्यादा गंभीर हो तो वहां स्टेंट लगाया जा सकता है। स्टेंट एक छोटी जालीदार ट्यूब होती है, जो नस को खुला रखने और उसमें रक्त का प्रवाह बनाए रखने में मदद करती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में बंद स्थान पर सीमित मात्रा में खून का थक्का गलाने वाली दवा भी दी जा सकती है। इसका उद्देश्य जरूरत के अनुसार स्थानीय स्तर पर उपचार करना और पूरे शरीर में दवा देने से होने वाले रक्तस्राव के जोखिम को कम रखना है। तीन गंभीर मरीजों में दिखा तेजी से असर डॉ. सौम्यता शर्मा के अनुसार हाल ही में तीन जटिल मरीजों का इस तकनीक से उपचार किया गया, जिनमें उपचार के बाद कुछ ही घंटों में स्पष्ट सुधार देखने को मिला। 71 वर्षीय डायलिसिस मरीज 71 वर्षीय महिला गंभीर किडनी रोग से पीड़ित थीं और नियमित डायलिसिस पर थीं। उनके प्लेटलेट्स कम थे और उन्हें बार-बार खून की खांसी भी हो रही थी। ऐसे में खून का थक्का गलाने वाली दवा देना जोखिमभरा हो सकता था। अचानक उनके बाएं हाथ में गंभीर सूजन आ गई। जांच में छाती की एक प्रमुख नस लगभग पूरी तरह बंद मिली। डॉक्टरों ने स्टेंटिंग की। उपचार के करीब 12 घंटे बाद हाथ की सूजन में उल्लेखनीय कमी आई। छह महीने के फॉलोअप में भी समस्या दोबारा सामने नहीं आई। 68 वर्षीय मरीज में सूजन के साथ सांस की परेशानी दूसरा मरीज गंभीर संक्रमण से जूझ रहा था। उसे सेप्टिक शॉक, कई अंगों के काम प्रभावित होने और किडनी फेलियर की स्थिति थी। इस दौरान चेहरे और बाएं हाथ में तेजी से सूजन आने लगी और सांस लेने में परेशानी भी बढ़ गई। जांच में बड़ी नसों में खून का थक्का मिला। मरीज की स्थिति को देखते हुए वेनोप्लास्टी और स्टेंटिंग की गई। प्रभावित स्थान पर सीमित मात्रा में थक्का गलाने वाली दवा भी दी गई। उपचार के करीब 24 घंटे के भीतर सूजन और सांस लेने की तकलीफ में स्पष्ट सुधार देखा गया। 66 वर्षीय लंग कैंसर मरीज तीसरे मरीज को लंग कैंसर था। कैंसर के कारण सुपीरियर वेना कावा और इनोमिनेट वेन में गंभीर ब्लॉकेज हो गया था। इसके कारण चेहरे और दोनों हाथों में अत्यधिक सूजन के साथ सांस लेने में परेशानी हो रही थी। मरीज की नस में स्टेंट लगाया गया। इसके बाद करीब 12 घंटे में सूजन तेजी से कम हुई और मरीज को आगे के कैंसर उपचार के लिए भेजा गया। बड़ी सर्जरी के बजाय कैथेटर से उपचार इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बड़ी सर्जरी के बजाय कैथेटर आधारित प्रक्रिया से बंद नस को खोलने का प्रयास किया जाता है। इससे ऐसे गंभीर मरीजों में उपचार का विकल्प मिल सकता है, जिनके लिए सामान्य सर्जरी या थक्का गलाने वाली दवा देना जोखिमभरा हो सकता है। डॉ. सौम्यता ने कहा कि सही मरीज में सही समय पर उपचार होने पर कुछ ही घंटों में रक्त प्रवाह और लक्षणों में सुधार देखा जा सकता है। हालांकि, यह एक विशेषज्ञ चिकित्सा प्रक्रिया है और इसका निर्णय मरीज की स्थिति के आधार पर ही किया जाना चाहिए।