राजस्थान फिल्म फेस्टिवल के तहत रीजनल फिल्मों को लेकर आयोजित टॉक शो में बॉलीवुड एक्टर शरमन जोशी, ईशा कॉपिकर, ममता कुलकर्णी सहित देशभर से आए फिल्ममेकर, कलाकार और संगीतकारों ने हिस्सा लिया। क्षेत्रीय सिनेमा की ताकत और उसकी संभावनाओं पर बात करते हुए एक्टर शरमन जोशी ने कहा कि जहां भारत की आत्मा बसती है, वहां की कहानी कहना सबसे बड़ा कर्म है। उन्होंने कहा कि रीजनल फिल्में देश के अलग-अलग अंचलों में रहने वाली ऑडियंस को अपनी कहानियों से जोड़ रही हैं। यही इन फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत है और यही अलग-अलग भाषाओं के प्रति लोगों का प्रेम भी है। टॉक शो में बंगाली फिल्म ‘कॉरपूर’ के निर्देशक अरिंदम सिल, पंजाबी फिल्म ‘मां जाए’ के निर्देशक नवनीत सिंह, तमिल फिल्म ‘इंद्रा’ के निर्देशक सबरीश नंदा राधाकृष्णन और मलयालम फिल्म ‘धीरम’ के निर्देशक जितिन सुरेश टी शामिल हुए। इसके अलावा मलयालम फिल्म ‘थलवारा’ के निर्देशक अखिल अनिलकुमार, तमिल फिल्म ‘येलो’ के लेखक हरि महादेवन और ओड़िया फिल्म ‘चरिधाम’ के अभिनेता सुजीत पैकराय ने भी चर्चा में हिस्सा लिया। यह आयोजन दुर्गापुरा स्थित होटल रॉयल ऑर्किंड में हुआ। यहां देखिए इवेंट के फोटोज…
अब दर्शक ही किंग है, उसे दो घंटे कुर्सी पर बैठाए रखना चुनौती: ईशा कोपिकर अभिनेत्री ईशा कोपिकर ने कहा कि दक्षिण भारतीय सिनेमा ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है। अब कंटेंट तेजी से बदल रहा है और डिजिटलाइजेशन ने सिनेमा देखने का तरीका भी बदल दिया है। आज एक्सपेरिमेंटल सिनेमा के लिए रास्ते खुले हैं और दर्शक भी पहले की तुलना में ज्यादा स्मार्ट हो गया है। उन्होंने कहा कि आज कंटेंट के बाद ऑडियंस ही किंग है। दर्शकों के पास मनोरंजन के बहुत सारे विकल्प हैं और वे बहुत जल्दी एक कंटेंट से दूसरे कंटेंट पर चले जाते हैं। सोशल मीडिया और रील्स ने दर्शकों के अटेंशन स्पैन को भी प्रभावित किया है। लोग कुछ सेकंड की रील देखते हैं और तुरंत दूसरे कंटेंट पर चले जाते हैं। अभी हॉरर देख रहे हैं तो कुछ ही देर में कॉमेडी या कोई दूसरा कंटेंट देखने लगते हैं। ईशा ने कहा कि ऐसे दौर में किसी दर्शक को दो घंटे तक थिएटर की सीट पर बैठाए रखना आसान नहीं है। यह फिल्ममेकर और राइटर्स के सामने बड़ी चुनौती है। अब लेखकों को दर्शकों की बदलती पसंद को समझते हुए कुछ अलग और बेहतर लिखने के लिए पहले से ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। शरमन जोशी बोले-वर्ल्ड क्लास कहानियों के लिए मंच भी वैसा ही चाहिए शरमन जोशी ने कहा कि भारत के अलग-अलग हिस्सों की अपनी संस्कृति, भाषा और कहानियां हैं। क्षेत्रीय सिनेमा इन्हीं कहानियों को दर्शकों तक पहुंचा रहा है। देशभर में अलग-अलग अंचलों में रहने वाली ऑडियंस इन कहानियों से खुद को जोड़ पाती है। यही रीजनल सिनेमा की ताकत है। उन्होंने कहा कि हर राज्य में टैलेंट की कोई कमी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि कलाकारों और फिल्ममेकर्स को वर्ल्ड क्लास स्टैंडर्ड का मंच और सुविधाएं मिलें। हमारी कहानियां वर्ल्ड स्टैंडर्ड की हैं, इसलिए उन्हें पेश करने का स्तर भी उसी तरह का होना चाहिए। शरमन ने सिंगल स्क्रीन थिएटरों को बचाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिंगल थिएटरों ने ही क्षेत्रीय फिल्मों को बड़ा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज सिनेमा देखने का तरीका बदल रहा है, ऐसे में इन थिएटरों को मजबूती से खड़ा रखना हमारी जिम्मेदारी है। रीजनल सिनेमा भारत की ताकत है: ममता कुलकर्णी अभिनेत्री ममता कुलकर्णी ने कहा कि राजस्थान से उनका पुराना फिल्मी जुड़ाव रहा है। उनकी फिल्मों और गानों की शूटिंग राजस्थान में हुई है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत भी तमिल फिल्म से की थी और इसके बाद कई क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री में काम किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग भाषाओं में काम करना भारत की ताकत है। देश की अलग-अलग भाषाओं में लोगों का मनोरंजन करने के साथ उनकी कहानियों को खास बनाने का काम सिनेमा कर रहा है। भारत में क्षेत्रीय फिल्मों का प्रभाव हमेशा बना रहेगा। भाषा और संस्कृति को सिनेमा के जरिए दुनिया तक पहुंचाना उद्देश्य: संजना शर्मा आरएफएफ की फाउंडर और डायरेक्टर संजना शर्मा ने कहा कि फेस्टिवल शुरू करने का उद्देश्य हमेशा से रीजनल कलाकारों को प्रमोट करना और उन्हें ऐसा मंच देना रहा है, जहां वे अपनी कला, भाषा और संस्कृति को देश-दुनिया के सामने ला सकें। देश के अलग-अलग राज्यों में बनने वाली रीजनल फिल्मों के निर्माता और निर्देशकों को एक मंच पर लाना भी रहा है। फिल्ममेकर शबरीश नंदा ने कहा कि क्षेत्रीय फिल्मों में इतिहास और आध्यात्मिकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। अलग-अलग फिल्म इंडस्ट्री के कलाकार और फिल्ममेकर अब एक-दूसरे के साथ काम कर रहे हैं। तमिल इंडस्ट्री का कोई मेकर मलयालम सिनेमा में काम कर रहा है तो उसे वहां के अनुभव भी मिल रहे हैं। ओडिया फिल्म अभिनेता सुजीत पाइकरे ने कहा कि उन्होंने एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनाई और उसे फेस्टिवल में जगह मिली। राजस्थान फिल्म फेस्टिवल में आना उनके लिए खास अनुभव है। उन्होंने कहा कि एक ही जगह पर अलग-अलग क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े फिल्ममेकर और कलाकार एक साथ मौजूद हैं। ऐसे मंच पर न सिर्फ विचारों का आदान-प्रदान होता है, बल्कि नए लोगों से जुड़ने और साथ मिलकर काम करने के अवसर भी बनते हैं।
राजस्थानी अभिनेता-निर्देशक क्षितिज कुमार ने कहा कि किसी भी रीजनल फिल्म इंडस्ट्री का दौर 10-15 साल तक खराब हो सकता है, लेकिन अचानक कोई एक फिल्म जनता को पसंद आती है तो वह पूरी इंडस्ट्री के लिए बदलाव लेकर आती है। राजस्थानी फिल्मों का दौर फिर लौट सकता है: डायरेक्टर राजेंद्र गुप्ता राजस्थानी फिल्म निर्देशक राजेंद्र गुप्ता ने कहा कि एक समय ऐसा था जब बॉलीवुड के कलाकार भी राजस्थानी फिल्मों में काम करना चाहते थे। राकेश रोशन के अलावा माधुरी दीक्षित ने भी राजस्थानी फिल्मों में काम किया है। उन्होंने कहा कि आज राजस्थानी फिल्मों के सामने संकट जरूर है, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब राजस्थानी सिनेमा फिर से व्यावसायिक रूप से अपनी जगह बनाएगा। आरएफएफ के प्रोग्रामिंग हेड अनिल कुमार जैन ने कहा कि राजस्थान में कहानियों और कंटेंट की कोई कमी नहीं है। हमारे पास इतिहास, संस्कृति और लोककथाओं से जुड़ी ऐसी बहुत सी कहानियां हैं, जिन पर अभी काम होना बाकी है। महिला केंद्रित फिल्मों से परिवार और समाज जुड़ता है: दीपक पाटिल मराठी फिल्म ‘आशा’ के निर्देशक दीपक पाटिल ने महिला केंद्रित फिल्मों की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब महिलाओं को केंद्र में रखकर फिल्में बनाई जाती हैं तो उनके जरिए समाज और परिवार के बीच संवाद बढ़ता है। ऐसे विषय क्षेत्रीय सिनेमा में सामाजिक जागरूकता पैदा करने के साथ दर्शकों को परिवार के साथ बैठकर फिल्म देखने का अवसर भी देते हैं। अवॉर्ड से आगे कलाकार और फेस्टिवल का रिश्ता: श्रवण सागर कल्याण राजस्थानी अभिनेता श्रवण सागर कल्याण ने कहा कि राजस्थान फिल्म फेस्टिवल जैसे मंच पर निर्माता, निर्देशक, ब्रांड और दूसरे फिल्म प्रोफेशनल्स के बीच कलाकारों की मौजूदगी और लाइव परफॉर्मेंस दर्शकों व प्रशंसकों से सीधा जुड़ाव बढ़ाती है। उन्होंने कहा कि अगर कोई कलाकार सिर्फ अवॉर्ड लेने के बजाय मंच पर परफॉर्म करता है तो वह अपनी पर्सनैलिटी, एनर्जी और एंटरटेनमेंट वैल्यू भी दर्शकों के सामने रखता है। लंबे समय तक किसी अवॉर्ड फेस्टिवल से जुड़े रहने पर रिश्ता सिर्फ कलाकार और आयोजन का नहीं रहता, बल्कि उसमें अपनापन और विश्वास बनता है। निर्देशक सोनू रंदीप चौधरी की फिल्म ‘ओमलो’ को राजस्थान फिल्म फेस्टिवल में मिले नौ नामांकनों को लेकर भी चर्चा हुई। उनसे फिल्म के सफर और विभिन्न मंचों पर मिली पहचान के अनुभव के बारे में सवाल किए गए।