सीकर के रामलीला मैदान में 45 फीट के रावण का दहन किया गया। वर्ष 1953 से चली आ रही इस परंपरा के तहत रामलीला मैदान में रंग-बिरंगी आतिशबाजी और भव्य झांकियों के इस आयोजन को देखने के लिए मैदान में भारी जनसैलाब उमड़ा। दशहरा महोत्सव के तहत शाम 6 बजे बावड़ी गेट स्थित रघुनाथजी मंदिर से भगवान श्रीराम की पारंपरिक शाही सवारी निकाली गई। सवारी में भगवान राम, लक्ष्मण, विभीषण, अंगद और हनुमानजी के जीवंत स्वरूपों के साथ आकर्षक झांकियां शामिल थीं। यह शोभायात्रा रघुनाथजी मंदिर से रवाना होकर जाट बाजार, सूरजपोल गेट, घंटाघर, न्यू दूजोद गेट और मध्यमंदिर रोड से होते हुए मुख्य कार्यक्रम स्थल रामलीला मैदान पहुंची। मार्ग में जगह-जगह पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। सांस्कृतिक मंडल के संयुक्त मंत्री जानकीप्रसाद इंदौरिया ने बताया कि इस बार 45 फीट ऊंचे रावण के पुतले पर विशेष रोशनी की व्यवस्था की गई थी, जिसके तहत रावण की आंखें जगमगाती नजर आईं। पुतला दहन से पहले मैदान में भरत मिलाप, हनुमानजी द्वारा अशोक वाटिका से सीताजी को लाने और विभीषण के राज्याभिषेक के मनमोहक प्रसंग प्रस्तुत किए गए। इसके बाद महाआरती हुई और संतों के सानिध्य में शाम 7:30 बजे भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक किया गया। 15 दिन की मेहनत से तैयार हुआ था पुतला इस भव्य आयोजन के पीछे तीन मुख्य कारीगरों की 15 दिन की कड़ी मेहनत जुड़ी थी। मुख्य कारीगर भवानी शंकर (खंडेला निवासी) का परिवार पिछले करीब तीन दशकों से सीकर में रावण का यह पुतला तैयार कर रहा है। पुतले के निर्माण में 40 बांस, 15 से 20 किलो रद्दी अखबार, 50 बोरे टाट, जयपुर से मंगाई गई रंगीन ब्लैक शीट, जीआई तार, मैदा लेई और पोस्टर कलर का उपयोग किया गया। क्रेन की सुविधा न होने के कारण पिछले कुछ वर्षों से पुतले की ऊंचाई 45 फीट ही रखी जा रही है। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के तहत पुतले के चारों तरफ 70 फीट का गोल घेरा बनाया गया था।