दैनिक भास्कर ने लकड़ी तस्करी को लेकर जब अधिकारियों से बात की तो अधिकारी हरकत में आए व टीम गठित की। वन मंडल के अधीन क्षेत्र में माहवार गश्ती दल गठित किए गए हैं। डीएफओ प्रदीप कुमार ने बताया कि दल संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त करेंगे। सुभाषसिंह, सहायक वनपाल के नेतृत्व वाला दल सितंबर, दिसंबर, मार्च व जून में, रघुवीर सिंह, वनपाल के नेतृत्व वाला दल अक्टूबर, जनवरी, अप्रैल व जुलाई में तथा छीतरलाल, सहायक वनपाल के नेतृत्व वाला दल नवंबर, फरवरी, मई व अगस्त में गश्त करेगा। लकड़ी परिवहन के लिए टीपी जरूरी, पंचमेल के नाम पर छूट नहीं : लकड़ी की 32 प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके परिवहन पर छूट मिलती है। लेकिन उसके लिए टीपी लेनी होती है। रिटायर्ड वन अधिकारी बताते हैं कि प्रदेश में लकड़ी के व्यावसायिक परिवहन के लिए राजस्थान वन उपज (परिवहन) नियम, 1957 लागू हैं। सामान्य तौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक लकड़ी ले जाने के लिए अधिकृत वन अधिकारी से ट्रांजिट पास (टीपी) लेना जरूरी है। रास्ते में वन नाके पर इसकी जांच भी हो सकती है। {लेकिन टीपी नहीं ली जाती। हालांकि कुछ प्रजातियों को परिवहन नियमों से छूट दी गई है। इस बीच अवैध लकड़ी परिवहन को लेकर भास्कर टीम ने नीमकाथाना, थोई, श्रीमाधोपुर, अजीतगढ़, गुहाला, रींगस व दांता सहित कई इलाकों में जाकर पड़ताल की। है। पंचमेल लकड़ी का बाजार भाव 550 से 700 रुपए क्विंटल मानें तो रोज का कारोबार करीब 15.40 से 19.60 लाख रुपए है। यानी हर महीने करीब 5.88 करोड़ रुपए का कारोबार हो रहा है। गुहाला, रेनवाल, थोई और दांता सहित कई बड़ी मंडियां हैं, जहां से रोज लकड़ी के 40 से ज्यादा ट्रक बाहर जा रहे हैं। जिम्मेदार सिर्फ फौरी कार्रवाई कर वाहवाही लूट रहे हैं। लकड़ी तस्करी के नेटवर्क में 40 से अधिक ट्रक, 200 पिकअप और 100 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां शामिल हैं। 100 से ज्यादा अवैध आरा मशीनें संचालित हो रही हैं। श्रीमाधोपुर, अरणियां, महरोली, गुहाला, नीमकाथाना, थोई, दांता, रींगस और रेनवाल की बड़ी मंडियां हैं। भास्कर टीम तस्करी वाले इलाकों में पहुंची और ग्रामीणों से बात की। ग्रामीण बताते हैं कि लकड़ी ले जाने वाले वाहनों के लिए अलग-अलग मार्गों का इस्तेमाल किया जाता है। थोई से गुहाला-अजीतगढ़ होते हुए शाहपुरा-कोटपूतली मार्ग का उपयोग अधिक हो रहा है। दूसरा चला-नीमकाथाना-पाटन से हरियाणा की ओर जाने वाला रास्ता प्रमुख है। इन रास्तों पर कई स्थानों पर वन विभाग की रेंज और आधा दर्जन पुलिस थाने भी आते हैं। खास बात ये है कि कार्रवाई की सूचना मिलने पर वाहन रास्ता बदल लेते हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या विभागों के बीच निगरानी और सूचना तंत्र प्रभावी है? विभाग की मिलीभगत से भी इनकार नहीं किया जा सकता। धर्मेन्द्र सिंह नाथावत | सीकर जिले में 68 हजार हैक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र है, जो 7 रेंज में विभाजित है। लेकिन विभाग जंगलों की निगरानी और अपराध रोकने को लेकर बड़ी लापरवाही बरत रहा है। अवैध खनन और लकड़ी तस्करी जोरों पर है। हैरानी की बात ये है कि पिछले महीने डीएफओ ने अपने स्तर पर ही गश्ती दल के प्रभारी एसीएफ के दायित्व छीन लिए। वहीं, एक गश्ती दल कर्मचारी को डेपुटेशन पर पाटन भेज दिया। इसके बाद तस्करी और बढ़ गई। दरअसल, जिले में कई संवेदनशील इलाके हैं, जहां इस तरह के अपराध ज्यादा हैं। जनवरी 2025 में एसीएफ वन्य जीव को गश्ती दल का प्रभारी बनाया गया था। इसके बाद अपराधों पर अंकुश लगा, लेकिन अब प्रभारी का दायित्व हटाते ही अपराध बढ़े हैं। सीकर. थोई एरिया मे बेखौफ लकड़ी परिवहन हो रहा है। ^जिले में लकड़ी परिवहन को लेकर सख्ती बरती जा रही है। पिछले दिनों कई वाहन भी सीज किए हैं। जल्दी ही गश्ती दल की टीम बनाएंगे व रात्रि में निरीक्षण करेंगे । हमारी रेंज स्तर की टीमें निगरानी करती रही हैं, जिससे वन अपराध पर अंकुश भी लगा है। -प्रदीप कुमार, डीएफओ