सकतपुर| नदीपार क्षेत्र का शेरगढ़ गांव कभी कोषवर्धनपुर के नाम से जाना जाता था। यह गांव अलग-अलग समय में बौद्ध, जैन धर्म के साथ शैव और वैष्णव धर्म का भी केंद्र रहा है। कोटा दरबार ने शेरगढ़ को बरसाना घोषित किया था। किले के पीछे परवन नदी किनारे खेतों के बीच विशाल चबूतरे बने हैं। इनमें से एक चबूतरे पर भूतेश्वर महादेव की स्वयंभू प्रतिमा है। यह उज्जैन महाकाल जैसी दिखती है। शेरगढ़ निवासी नरेंद्र सिंह और दिनेश गुर्जर ने बताया कि किले की स्थापना संवत 790 में हुई थी। इसके बाद 10वीं से 13वीं शताब्दी में नागवंशी राजाओं ने यहां विशाल शिवलिंग बनवाए। नंदी को ग्रामीणों ने स्थापित किया है। चारों तरफ बारीकी से अलग-अलग अलंकरण बने हैं। यहां पहुंचने के लिए कोट लांघना पड़ता है। खेतों की बाढ़ लांघनी पड़ती है। सावन के दिनों में भक्त श्रद्धालु विशेष आस्था के साथ यहां पहुंचते हैं।