पीबीएम अस्पताल में डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की किडनी खराब होने, गंभीर संक्रमण और मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस साल जनवरी से सितंबर तक 36 प्रसूताओं की जान जा चुकी है। इनमें से 20 मौतें मई से अब तक हुई हैं। इस गंभीर मामले में एक तरफ जहां एंटीबायोटिक टैबलेट “मेट्रोनिडाजोल’ का सैंपल जांच में फेल हो चुका है, वहीं 5 महत्वपूर्ण सर्जिकल डिवाइस की रिपोर्ट अब तक कोलकाता की सेंट्रल ड्रग टेस्टिंग लेबोरेटरी में अटकी हुई है। कोलकाता भेजी गई जिन सर्जिकल आइटम्स की रिपोर्ट लंबित है, उनमें कैनुला, तीन अलग-अलग तरह की सीरिंज, ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेट और आईवी सेट शामिल हैं। सहायक औषधि नियंत्रक देवेंद्र केदावत ने कोलकाता लेबोरेटरी से संपर्क साधकर इन रिपोर्ट्स को जल्द से जल्द भेजने का आग्रह किया है। अधिकारियों का कहना है कि नियमानुसार ऐसी जांच रिपोर्ट 60 दिनों के भीतर आ जानी चाहिए, लेकिन समय बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है। प्रशासन अब कोलकाता लैब से आने वाली 5 सर्जिकल डिवाइस की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है, जिससे यह साफ हो सके कि संक्रमण फैलने में इन मेडिकल उपकरणों की कोई भूमिका थी या नहीं। हालांकि जनाना अस्पताल के ओटी में सुधार अब तक नहीं हो पाया है। न पर्याप्त जगह है न ही खुद का आईसीयू। जनाना और एमसीएच बिल्डिंग में शिफ्ट करने के लिए करीब पांच करोड़ रुपए चाहिए, जिसके प्रस्ताव भी सरकार के पास पेंडिंग हैं। सहायक औषधि नियंत्रक ने कोलकाता लैब से साधा संपर्क, रिपोर्ट के इंतजार में अफसर 26 दवाओं के सैंपल पास, मेट्रोनिडाजोल पेट में घुलने में ले रही थी ज्यादा समय : ड्रग कंट्रोलर विभाग ने पीबीएम अस्पताल के जनाना वार्ड, सेंट्रल स्टोर और ड्रग वेयरहाउस से कुल 32 तरह की दवाओं व सर्जिकल आइटम्स के सैंपल जब्त किए थे। अब तक प्राप्त 26 दवाओं की जांच रिपोर्ट में से एंटीबायोटिक ‘मेट्रोनिडाजोल’ (बैच नंबर T 4500) का सैंपल अमानक (फेल) पाया गया। जयपुर ड्रग टेस्टिंग लैब की रिपोर्ट के अनुसार, यह दवा मरीज के पेट में तय समय में घुल नहीं पा रही थी। यह दवा मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के तहत हरियाणा की एक फर्म से खरीदी गई थी। नियम उल्लंघन पर निर्माता कंपनी के खिलाफ कार्रवाई के लिए हरियाणा ड्रग कंट्रोल विभाग को पत्र लिखा गया है। ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे पर जोर : प्रसूताओं की लगातार होती मौतों और मॉर्टेलिटी (मृत्यु दर) के आंकड़ों को लेकर राज्य सरकार और प्रशासन बेहद गंभीर हैं। लगातार समीक्षा बैठकें हो रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे में व्यापक सुधार पर जोर दिया जा रहा है, ताकि गंभीर मरीजों को रेफर करने के बजाय शुरु में ही सही इलाज मिल सके। परिजनों का आरोप : परिजनों का कहना है कि कागजों में तो वरिष्ठ डॉक्टरों का मेडिकल बोर्ड गठित कर दिया गया है, लेकिन धरातल पर प्रसूताओं का इलाज केवल जूनियर रेजिडेंट डॉक्टरों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। आईसीयू में समय पर बेड न मिलने, बीपी व अन्य जरूरी दवाएं सही समय पर न देने और सीनियर डॉक्टरों के नदारद रहने के कारण प्रसूताओं की स्थिति बिगड़ रही है। हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के केसेज में प्रसव बाद मृत्यु दर इस साल 36 है, जो पिछले साल के मुकाबले 4 कम है। 2025 में सितंबर माह तक 40 प्रसूताओं की मृत्यु हुई थी। ओटी को संक्रमण मुक्त करने के सभी उपाय किए जाते हैं। डॉ. सुरेंद्र वर्मा, प्रिंसिपल, एसपीएमसी