उदयपुर नगर निगम की राजनीति में पारस सिंघवी का सियासी सफर टिकट कटने के बाद बगावत से लेकर मेयर की कुर्सी तक पहुंचा है। कभी पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर अपनों के खिलाफ बगावत कर दी थी। सिंघवी ने अब मेयर चुनाव में 55 वोट हासिल कर जीत दर्ज की है। उनकी सियासी यात्रा में टिकट कटने, बगावत और अब मेयर बनने का यह पूरा घटनाक्रम खास चर्चा में है। भाजपा के कद्दावर नेता पारस सिंघवी ने उदयपुर नगर निगम के नए मेयर के रूप में शपथ ले ली है। इस चुनाव की सबसे मजेदार बात यह रही कि भाजपा के पास बहुमत के लिए सिर्फ 53 पार्षद थे, लेकिन जब वोटिंग हुई तो सिंघवी के खाते में पूरे 55 वोट आए। यानी दो विपक्षी या निर्दलीय पार्षदों ने भी चुपके से सिंघवी के पक्ष में मतदान कर दिया। वोटों की गणित दिखाती हैं कि पारस सिंघवी का रसूख पार्टी की सीमाओं से कहीं ऊपर है। गजपाल सिंह और प्रमोद सामर के साथ जमी ‘त्रिमूर्ति’ उदयपुर की राजनीति को करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि सिंघवी की इस सफलता के पीछे संगठन में उनकी मजबूत घेराबंदी रही है। जब से गजपाल सिंह राठौड़ उदयपुर शहर भाजपा के जिला अध्यक्ष बने, तब से शहर में तीन नेताओं की एक खास तिकड़ी काम कर रही थी। इस तिकड़ी में जिला अध्यक्ष गजपाल सिंह के साथ प्रमोद सामर और पारस सिंघवी शामिल थे। धीरे-धीरे इस जोड़ी में पारस सिंघवी जिला अध्यक्ष के सबसे भरोसेमंद और करीबी बन गए। इसी मजबूत जुगलबंदी का नतीजा है कि बगावत के बाद भी पार्टी ने उन पर भरोसा जताया और वे मेयर की कुर्सी तक पहुंच गए। जब टिकट कटने पर छलका था दर्द पारस सिंघवी का मेयर बनने तक का सफर आसान नहीं रहा। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने उदयपुर शहर सीट से भाजपा टिकट के लिए मजबूत दावेदारी पेश की थी। लेकिन पार्टी ने उनकी जगह ताराचंद जैन को उम्मीदवार बना दिया। टिकट कटने से नाराज सिंघवी ने खुलकर बगावत कर दी थी। 21 अक्टूबर 2023 को कार्यकर्ताओं के बीच वे बेहद भावुक हो गए थे और उन्होंने पार्टी को आर-पार की लड़ाई की चेतावनी दे डाली थी। उस वक्त उन्होंने मेवाड़ भाजपा के सबसे बड़े नेता गुलाबचंद कटारिया पर भी सीधे निशाने साधे थे। इस खींचतान के चलते नवंबर 2024 में उन्होंने उप-महापौर (डिप्टी मेयर) का पद भी छोड़ दिया था। लेकिन राजनीति का चक्र घूमा और आज वे उसी नगर निगम के सबसे बड़े पद पर काबिज हो चुके हैं। गैराज कमेटी के अध्यक्ष से मेयर की कुर्सी तक का सफर पारस सिंघवी के पास नगर निगम का इतना लंबा अनुभव है कि वे निगम के कोने-कोने से वाकिफ हैं। वे सीधे मेयर की कुर्सी पर नहीं बैठे हैं, बल्कि उन्होंने निगम की सीढ़ियां धीरे-धीरे चढ़ी हैं। उनका यह सफरनामा बेहद दिलचस्प है। लखनऊ से अयोध्या तक पैदल यात्रा पारस सिंघवी की पहचान सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि एक समर्पित रामभक्त और पुराने कारसेवक की भी है। 10 मई 1964 को जन्मे सिंघवी बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे हैं और संघ शिक्षा में द्वितीय वर्ष शिक्षित हैं। उनके जीवन का सबसे बड़ा वाकया राम मंदिर आंदोलन के दौरान का है। तब वे लखनऊ से पैदल यात्रा करते हुए अयोध्या पहुंचे थे। पिछले 40 सालों से वे जनसंघ और भाजपा के लिए लगातार काम कर रहे हैं। वे 1987 में श्रमजीवी कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे और बाद में भाजपा युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष और प्रदेश मंत्री भी बने। साल 2007 में उन्हें नगर विकास प्रन्यास (UIT) उदयपुर का ट्रस्टी भी बनाया गया था। जयपुर से दिल्ली तक मजबूत कनेक्शन पारस सिंघवी को संगठन में बहुत मजबूत माना जाता है। वे सिक्किम के राज्यपाल ओम माथुर के बेहद करीबी हैं। इसके साथ ही राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से भी उनके सीधे संबंध हैं। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर विरोध के बावजूद जयपुर और दिल्ली के स्तर पर उनकी पैरवी हमेशा मजबूत रही। सफल कारोबारी और सामाजिक चेहरा राजनीति से इतर पारस सिंघवी उदयपुर के एक बड़े कारोबारी भी हैं। उनका ट्रेवल्स और होटल का बड़ा बिजनेस है। उदयपुर में उनकी 'पारस होटल' और 'पारस ट्रेवल्स' के नाम से बसें चलती हैं। वे उदयपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स (UCCI) के रिकॉर्ड छठी बार अध्यक्ष चुने गए हैं। इसके साथ ही वे दिगंबर जैन नरसिंहपुरा समाज के अध्यक्ष के रूप में सामाजिक कार्यों में भी हमेशा आगे रहते हैं।