इमरजेंसी, सीजनल डिजीज वार्ड, आईसीयू सहित मेडिसिन विंग के तमाम वार्ड्स पर ताले लटके हैं। खिड़की-दरवाजों के टूटे शीशों से अंदर झांकें तो हर तरफ गंदगी का अंबार दिखता है। पलंग और बिस्तर उलट-पुलट पड़े हैं, जिन पर धूल की मोटी परत चढ़ चुकी है। कभी जिन गलियारों में मरीजों की भारी भीड़ उमड़ती थी और इसी मौसम में लोग फर्श पर लेटने को मजबूर होते थे, वहां आज भयानक सन्नाटा पसरा है। खाली पड़े कमरों और कॉरिडोर में आवारा पशु मंडराते नजर आते हैं। यह दुर्दशा उत्तर-पश्चिम राजस्थान और संभाग के सबसे बड़े पीबीएम जनाना-मरदाना अस्पताल परिसर की है। मेडिसिन विंग को नए भवन में शिफ्ट हुए पूरे दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन खाली हुए डी, ई, एफ, एच, आई, जे, के वार्डों सहित आईसीयू, पोस्ट-कोविड आईसीयू और इमरजेंसी के ढांचे को लेकर अस्पताल प्रशासन अब तक कोई ठोस फैसला नहीं ले पाया है। एक तरफ ऑर्थो, सर्जरी और गायनी विभाग मरीजों के लिए एक-एक बेड और आईसीयू के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दो महीने से सिर्फ कागजी चर्चाएं और बैठकों का दौर चल रहा है। तीनों विभागाध्यक्षों ने अधीक्षक के सामने अपनी मांगें रखीं, लेकिन लचर प्रशासनिक व्यवस्था के चलते नतीजा सिफर ही रहा। गायनी को आईसीयू की दरकार, सर्जरी शिफ्टिंग की फाइल भी ठंडे बस्ते में मरदाना अस्पताल के खाली हुए वार्डों को गायनी और सर्जरी विभागों को आवंटित करने की योजना सिर्फ कागजों में दौड़ रही है। प्रसूताओं की मौत और गंभीर इंफेक्शन (जैसे किडनी संक्रमण) के बढ़ते मामलों के बाद गायनी विभाग को ‘डी वार्ड’ में आईसीयू देने का भारी दबाव है, लेकिन जिम्मेदार फैसला टाल रहे हैं। सर्जरी विभाग को पुरानी मेडिसिन कैजुअल्टी में शिफ्ट करने का प्रस्ताव भी धूल फांक रहा है। ढीली प्रशासनिक कार्यप्रणाली के चलते सीधे तौर पर संभागभर से आने वाले हजारों असहाय मरीज पिस रहे हैं। सफाई और सुरक्षा पर 16 करोड़ का बजट, जब वार्ड ही बंद तो पैसा किसकी जेब में जा रहा? पीबीएम अस्पताल में सफाई व्यवस्था का ठेका 420 पॉइंट का 6 करोड़ रुपए और सुरक्षा का ठेका 300 गार्ड का करीब 10 करोड़ रुपए का है। यानी हर महीने लगभग 1 करोड़ रुपए भुगतान होने की बात सामने आ रही है। हैरानी की बात यह है कि मेडिसिन विंग खाली होने के बाद भी न तो ठेके के मैनपावर (श्रमिकों व गार्डों) में कोई कटौती की गई और न ही बजट में। बंद कमरों और खाली पड़े भवनों की रखवाली के लिए गार्ड तैनात दिखा दिए जाते हैं। दोनों ठेकों के नोडल अधिकारी डॉक्टर हैं, जो सिर्फ कागजों पर हाजिरी वेरिफाई करने तक सीमित हैं। कभी मौके पर जाकर पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाते। दूसरी तरफ, जहां वास्तव में जरूरत है, जैसे ट्रॉमा सेंटर, जनाना अस्पताल और मुख्य ओपीडी-वहां आए दिन जेबकतरों का बोलबाला है और ट्रॉमा में हर रात झगड़े हो रहे हैं। सुरक्षा चाक-चौबंद करने के बजाय सरकारी पैसे की खुली बर्बादी हो रही है। मरदाना विंग खाली होने के बाद मैन पावर में कटौती की जाएगी। इस संबंध में नोडल अधिकारी से रिपोर्ट मांगी जाएगी और भुगतान का भी पुनरावलोकन होगा। सर्जरी, गायनी और ऑर्थो तीनों विभागों को वार्ड आवंटित करने के लिए उच्चस्तरीय बैठक हुई है। जल्द ही इस पर अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा। - डॉ. बी. सी. घीया, अधीक्षक, पीबीएम अस्पताल