खुद ज्यादा पढ़ नहीं पाए तो स्कूल-कॉलेज खोलकर शिक्षा से जुड़ने का प्रयास किया, लेकिन कोरोना काल में इन्हें बंद करना पड़ा। इसके बाद पिता के भेड़-बकरी पालन को ही मॉडल और कमाई का जरिया बनाने की ठानी। योजना की जानकारी जुटाने के लिए पशुपालन विभाग के कई चक्कर लगाए। एक दिन अखबार में बकरी पालन की योजना के बारे में पढ़ा और आवेदन कर दिया। करीब दो साल के इंतजार के बाद एक करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट मंजूर हुआ, जिसमें केंद्र सरकार से 50 लाख रुपए की सब्सिडी मिली। जमीन गिरवी रखकर बैंक से लोन लिया और बकरी पालन को बड़े स्तर पर शुरू किया। अब बकरी के दूध से नेचुरल साबुन भी तैयार कर रहे हैं। आज पशुपालन से सालाना करीब 8 लाख रुपए की कमाई हो रही है। साथ ही युवाओं को खेती और पशुपालन से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनके प्रयासों को अफ्रीकी देश घाना की एक यूनिवर्सिटी ने मानद उपाधि देकर सम्मानित किया। मारवाड़ी नस्ल की बकरियों के संरक्षण के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिल चुका है। अब डेनमार्क के पशुपालन और खेती के मॉडल से प्रेरित होकर छह बीघा जमीन पर एग्रो टूरिज्म विकसित करने की तैयारी कर रहे हैं। म्हारे देश की खेती में आज बात बाड़मेर के युवा प्रगतिशील किसान की… पुश्तैनी मकान में स्कूल शुरू किया बाटाडू तहसील के झाक गांव के रहने वाले देवाराम पंवार (37) किसान और उद्यमी हैं। उनके पिता किशनाराम (56) भेड़-बकरी पालन करते थे। देवाराम ने बताया- 8वीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए 30 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। 11वीं की पढ़ाई बीच में छूट गई। परिवार ने शादी कर दी। जिम्मेदारियां बढ़ीं तो एक एनजीओ से जुड़ गया, जहां महीने के 3 हजार रुपए मिलते थे। देवाराम ने बताया- 2009 में एक लाख रुपए कर्ज लेकर पुश्तैनी मकान में 8वीं तक का स्कूल शुरू किया। इसे करीब 10 साल तक चलाया। सालाना करीब डेढ़ लाख रुपए की इनकम होती थी। 2019 में कॉलेज भी शुरू किया। कोरोना काल में स्कूल-कॉलेज बंद करने पड़े। रजिस्ट्रेशन किसी दूसरे को सौंप दिया। इसी दौरान मैंने D.El.Ed और फिर ग्रेजुएशन किया। कोरोना में औषधीय काढ़े से खेती का विचार आया देवाराम ने बताया कि कोरोना काल में औषधियों का महत्व समझ आया। उस दौरान जीवन बचाने के लिए लोग नीम और गिलोय जैसे औषधीय पौधों से तैयार काढ़े का सेवन कर रहे थे। यहीं से मुझे औषधीय पौधों की खेती करने का विचार आया। जयपुर स्थित राजस्थान स्टेट मेडिसिन प्लांट बोर्ड पहुंचा, जहां मुझे क्लस्टर (किसानों के समूह) के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद मैंने किसानों का एक समूह बनाया। गूगल की खेती पर प्रति किसान एक हेक्टेयर भूमि के लिए 2 लाख 10 हजार रुपए की सहायता मिल रही थी। 2021 में एक हेक्टेयर जमीन पर 550 पौधे लगाए। इस फसल में पानी की कम जरूरत होती है। ज्यादा पानी देने पर जड़ गलने की समस्या हो सकती है। यह पौधा खारे पानी में भी सर्वाइव कर जाता है, हालांकि इसमें दीमक का प्रकोप ज्यादा रहता है। दीमक से बचाव के लिए दवाओं का इस्तेमाल करने के बावजूद करीब 50 प्रतिशत पौधे ही खेत में बच पाए हैं। पिता के भेड़-बकरी पालन को मॉडल बनाया देवाराम ने बताया- पिता भेड़-बकरी पालन करते थे। इसी काम को मॉडल के रूप में विकसित करने का विचार किया। केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मथुरा (यूपी) के कई सेमिनार में गया। इस दौरान जयपुर में पशुपालन विभाग से जानकारी ली तो पता चला कि बकरी पालन के लिए स्कीम आने वाली है। अखबार में विज्ञप्ति देखकर 30 नवंबर 2021 को राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) के तहत 1 करोड़ रुपए के बकरी पालन प्रोजेक्ट के लिए आवेदन किया। इसमें 50% सब्सिडी थी। लंबे इंतजार के बाद 2023 में भारत सरकार से मंजूरी मिली और काम शुरू किया। बैंक लोन देने को तैयार नहीं था, इसलिए जमीन गिरवी रखनी पड़ी। इसके बाद 35 लाख रुपए का लोन मिला, जिसमें 15 लाख रुपए मार्जिन मनी (खुद का हिस्सा) रहा। सरकार से 50 लाख रुपए की सब्सिडी दो किस्तों में मिली। 500 बकरियां खरीदीं, 2024 में पूरा हुआ सेटअप देवाराम ने बताया- सबसे पहले 2024 में 10 हजार वर्गफीट में स्ट्रक्चर तैयार करवाया। जिस पर 26 लाख रुपए खर्च हुए। इसमें चारा रखने की व्यवस्था भी की गई। पशुपाल विभाग के फिजिकल वेरिफेशन के बाद पहली किस्त की सब्सिडी मिली। 500 बकरियां खरीदीं, जिन पर करीब 60 लाख रुपए खर्च हुए। इसके बाद 25 लाख रुपए की दूसरी किस्त मिली। पत्नी धापू देवी (35) को बताया था कि बकरी के दूध से साबुन बनते हैं। उसी के सहयोग से 2025 में साबुन बनाने का काम शुरू किया। इसमें 100 ग्राम के एक साबुन में 10 ग्राम दूध, 5 ग्राम एलोवेरा जेल, 80 ग्राम बेस और अन्य सामग्री का इस्तेमाल होता है। बेस को गर्म करके उसमें सभी सामग्री मिलाने के बाद सांचे में डाला जाता है। एक साबुन 60 से 70 रुपए में बिकता है। महीने में करीब 100 साबुन की बिक्री होती है। बकरियों के साथ भेड़ से भी हो रही कमाई किसान ने बताया कि केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI), अविकानगर, टोंक की ओर से मुझे अविसान नस्ल की पांच मादा और एक नर भेड़ दी गई थी। ये सभी करीब तीन महीने के बच्चे थे और एक भेड़ की कीमत लगभग 4 हजार रुपए थी। अविसान नस्ल की भेड़ एक बार में दो से तीन बच्चे देती है। 14 महीने में दो बार बच्चे दे सकती है। 12 महीने की भेड़ की कीमत करीब 15 हजार रुपए तक होती है। वहीं, ऊन 40 से 50 रुपए प्रति किलो की दर से बिकती है, इसलिए इससे विशेष मुनाफा नहीं है। इसके अलावा किसान के पास थारपार नस्ल की दो गायें भी हैं, जो रोज करीब 7 से 8 लीटर दूध देती हैं। किसान के मुताबिक, पशुपालन से सालाना करीब 8 लाख रुपए तक की आय हो जाती है। डेनमार्क से एग्रो टूरिज्म का आइडिया मिला देवाराम ने बताया- नॉलेज एन्हैंसमेंट प्रोग्राम के तहत राजस्थान सरकार ने 38 किसानों को डेनमार्क भेजा था, जिसमें बाड़मेर से मैं अकेला था। वहां पशुपालन और खेती के एडवांस मॉडल देखे, जिससे एग्रो टूरिज्म शुरू करने का विचार आया। लौटने के बाद टूरिज्म विभाग से कृषि पर्यटन इकाई स्थापित करने की परमिशन मांगी। स्वीकृति के बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर राजस्थान दलित, आदिवासी उद्यम प्रोत्साहन योजना (BRUPY) के तहत जिला उद्योग केंद्र में आवेदन किया। प्रोजेक्ट स्वीकृत होने के बाद अब 6 बीघा में एग्रो टूरिज्म का मॉडल तैयार कर रहा हूं। प्रोजेक्ट की लागत 33 लाख रुपए है। सरकार की ओर से 25 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है। प्रोजेक्ट में पारंपरिक मड हाउस (गोलदार झोपड़ी) बनाए जा रहे हैं। ईंटों से दीवार बनाकर गोबर का लेप और घास-फूस की छत तैयार की जा रही है। एक म्यूजियम में पुरानी और पौराणिक वस्तुओं का संग्रह रखकर प्रदर्शित किया जाएगा। यहां आने वाले पर्यटकों पशुपालन और खेती के बारे में बताया जाएगा। ऑर्गेनिक खान-पान को बढ़ावा दिया जाएगा। … खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए... खारे पानी-बंजर जमीन में लगाया अनार का बगीचा:लोग बोले- प्रॉपर्टी बेचनी पड़ जाएगी; अब सालाना 50 लाख की कमाई स्कूल में पढ़ते समय दोस्त के घर गया तो वहां अनार का बगीचा देखा। तब पता चला कि पौधे खारे पानी में भी पनप जाते हैं। पूरी खबर पढ़िए