सुप्रीम कोर्ट के SC-ST रिजर्वेशन के कोटे में से वंचित जातियों को अब अलग से कोटा देने के दो साल पहले के आदेश के बाद अब हाईकोर्ट ने एक याचिका के आधार पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किए हैं। हाईकोर्ट ने ST वर्ग के आरक्षण से जुड़े मामले में मुख्य सचिव, प्रमुख कार्मिक सचिव, एसटी आयोग और केंद्र सरकार से नोटिस के जरिए पूछा है कि- क्यों न ST वर्ग को दे रहे 12% आरक्षण में से 9% विशेष आरक्षण भील समुदाय को दे दिया जाए। याचिका में पंजाब राज्य बनाम देवेन्द्र सिंह में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया हुआ है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के बाद राज्य सरकारों के लिए जरूरतमंद जातियों को कोटे में से 'कोटा' देने के रास्ते खोल दिए हैं। हाईकोर्ट ने फिलहाल नोटिस भेज कर राज्य सरकार से जवाब मांगा है, लेकिन कानून के जानकारों के अनुसार हाईकोर्ट चाहे तो सरकार को आगे की प्रक्रिया अपनाने के आदेश भी दे सकता है। राज्य सरकार पूरी प्रक्रिया अपनाकर अपने विवेक से SC/ST सहित सभी वर्गों में वंचित जातियों को अलग से कोटा दे सकती है, लेकिन राह इतनी आसान नहीं है। इसके लिए पूरी प्रक्रिया अपनाने के साथ कुछ जातियों का विरोध भी सहना पड़ सकता है। राजस्थान में भी SC/ST वर्ग करीब 35% है। हाईकोर्ट के सरकार से जवाब मांगने के बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं... भास्कर ने एक्सपट्‌र्स से बात कर इन सवालों के जवाब जाने… किस मामले में हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है? जस्टिस इन्द्रजीत सिंह व जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने यह आदेश शंकर लाल दहिया व अन्य की याचिका पर दिया। याचिकाकर्ता आदिवासी भील आरक्षण संघर्ष समिति के सदस्य हैं। पैरवी कर रहे मनोज कुमार चौधरी ने हाईकोर्ट को कहा कि राज्य स्तर पर आरक्षण नहीं मिलने से भील व सहरिया के साथ सामाजिक भेदभाव हो रहा है। भील समुदाय को एसटी के लिए आरक्षित 12% आरक्षण में से 9% विशेष आरक्षण दें और तब तक किसी को नियुक्ति नहीं दी जाए। ST वर्ग में शामिल मीणा समुदाय सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक तौर पर बहुत आगे बढ़ चुका है। यही जाति ST वर्ग के 99 फीसदी आरक्षण का लाभ ले रही है। राज्य सरकार के पास भील समुदाय के पिछड़ेपन के कोई ठोस आंकडे़ नहीं हैं। साल 1931 के बाद भीलों के राज्य सेवाओं में प्रतिनिधित्व, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है। नेशनल ST आयोग ने 25 फरवरी को आर्टिकल 338ए के तहत मुख्य सचिव को पत्र लिखकर एसटी श्रेणी के उप वर्गीकरण और पंजाब राज्य बनाम देवेन्द्र सिंह में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए निर्णय को लागू करने के लिए कहा था। लेकिन राजस्थान सरकार ने ST श्रेणी का उप वर्गीकरण (कोटे में कोटा) नहीं किया है। क्या है राजस्थान में आरक्षण? राज्य सरकार के वर्तमान नियमों के अनुसार अलग-अलग वर्गों को मिलाकर कुल आरक्षण 64 फीसदी है। मेघवाल, बैरवा, नायक, खटीक जैसी जातियों को SC कोटे का रिजर्वेशन प्राप्त है। वहीं मीणा, मीना, भील, गरासिया जैसी जातियों को ST कोटे से रिजर्वेशन है। SC और ST, दोनों ही कोटे में 70 से अधिक जातियां व कई उपजातियां शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट नहीं मानता कि सारी जातियां एक जैसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के दो साल पहले आए फैसले में कहा गया कि सारी SC और ST जातियों की एक जैसी स्थितियां नहीं है। कुछ जातियां ज्यादा पिछड़ी हो सकती हैं, जैसे- जो सीवर की सफाई करते हैं और जो बुनकर का काम करते हैं। दोनों ही SC वर्ग में आते हैं, लेकिन वो बाकियों से ज्यादा पिछड़ी रहती हैं। उनके उत्थान के लिए राज्य सरकार SC/ST आरक्षण का सब-क्लासिफिकेशन कर अलग से कोटा निर्धारित कर सकती है। यह संविधान के आर्टिकल-341 के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने राज्यों के लिए जरूरी हिदायत भी दी है। उसमें कहा है कि राज्य सरकारें मनमर्जी से फैसला नहीं कर सकतीं। इसके लिए दो शर्तें होंगी… राज्य सरकार कैसे दे सकती है कोटे में से कोटा? राज्य सरकार निर्धारित आरक्षण कोटे से कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकती। ऐसे में निर्धारित कोटे के भीतर शामिल जातियों की स्थितियों के बारे में पता लगाना होगा। मतलब, जैसे हाल ही निकाय चुनाव से पहले OBC में शामिल जातियों का सर्वे हुआ, उसी तरह से SC/ST वर्ग में शामिल करीब 70 जातियों का भी सर्वे करवाना होगा। जो डेटा सामने आएगा, उसके आधार पर राज्य सरकार नौकरियों से वंचित जातियों को उसी रेशियो में कोटे में से कोटा निर्धारित कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश प्रदेश सरकारों को ये अधिकार देता है। सरकार चाहे तो अपना सकती है ये उपाय भी आरक्षण कोटे में से कोटा देने वाली रिपोर्ट को केंद्र सरकार के अधीन आने वाले नेशनल कमीशन फॉर SC या ST को भेजकर उससे राय ले सकती है। राज्य सरकार रिपोर्ट से या कमीशन की राय से संतुष्ट हुई, तो एक अधिसूचना के आधार पर कोटे में से कोटा लागू कर सकती है। सरकार चाहे तो रिपोर्ट के आधार पर अधिनियम (बिल) बनाकर विधानसभा के पटल पर रख सकती है। बहस के बाद अधिनियम को पारित कर राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए भेजा जा सकता है। राज्यपाल से पास होने के बाद गजट नोटिफिकेशन निकाला जा सकता है। राज्य सरकार के सामने क्या चुनौतियां आ सकती हैं?