नगर निगम की कचरा संग्रहण व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई है। भाजपा और कांग्रेस पार्षद टेंडर में धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप लगा चुके हैं। भास्कर ने नए और पुराने दोनों टेंडरों के कागजात निकाले और तुलना की। तुलना में कई ऐसे तथ्य सामने आए जिनसे पार्षदों की बात सही साबित हो रही है। दैनिक भास्कर के पास उपलब्ध आंकड़ों और पूर्व के टेंडरों से तुलना करने पर यह साफ होता है कि नई व्यवस्था और शर्तों के फेर में सरकार और आमजन के पैसों को भारी चूना लग रहा है। पूरे शहर में पिछले टेंडर और इस टेंडर में ट्रैक्टर-टिपर को मिलाकर करीब 34 करोड़ रुपए अतिरिक्त भुगतान किए जाएंगे। दरअसल निगम ने हाल ही में टिपर और ट्रैक्टरों का नया टेंडर पूर्व और पश्चिम जोन के हिसाब से किया है। 16 सितंबर को पुरानी फर्म का काम बंद होने के बाद नई फर्म ने 3 अक्टूबर को औपचारिक रूप से कार्यभार तो संभाल लिया है लेकिन फील्ड में व्यवस्था पटरी पर नहीं आई। कुल प्रतिमाह खर्च: पुराने टेंडर में लगभग 1.40 करोड़ रुपये (सालाना 16.80 करोड़ और 3 साल का 50.40 करोड़ रुपये)। जबकि अब नई शर्तों के तहत उसी कार्य के लिए 84 करोड़ रुपये चुकाए जा रहे हैं। नई व्यवस्था में भले ही 200 टिपर दिखाए जा रहे हों लेकिन कचरा उठाने की उनकी वास्तविक कार्यक्षमता उन 106 वाहनों के बराबर ही है जो पहले संचालित हो रहे थे। पेनल्टी के नाम पर खानापूर्ति और यूजर चार्ज का झोल नियमों के मुताबिक सेवा में कमी मिलने पर पेनल्टी का प्रावधान जरूर है लेकिन इसमें भी बड़ा खेल है। कुल पेनल्टी राशि का 60 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जिसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती और शेष 40 प्रतिशत में से ही पेनल्टी काटी जा सकती है। उस पर भी आम जनता कितनी शिकायतें दर्ज कराती है तो। यह जगजाहिर है मगर इसके कचरा संग्रहण के लिए मार्शल्स लगाए जा रहे हैं और यूजर चार्ज का एक अलग टेंडर भी है जिसमें कलेक्शन का 80-20 का अनुपात तय किया गया है यानी कुल वसूली का 20 प्रतिशत हिस्सा कंपनी के पास रहेगा। टेंडर निरस्त करना संभव नहीं... नुकसान ही उठाना पड़ेगा नगर निगम कमिश्नर इस पूरे टेंडर के खेल में सवालों के घेरे में हैं। क्योंकि जब टेंडर हुआ तब निगम में प्रशासक काल था। टेंडर में प्रशासक की ज्यादा कोई भूमिका नहीं रही। तब ना मेयर थे ना पार्षद। सीधी की बात है निगम आयुक्त ने ही बनाए गए टेंडर को देखा और चेक करके मंजूरी दी। भले ही इसमें एईएन से लेकर अन्य 10 लोग कमेटी में थे मगर सवाल तो आयुक्त पर ही उठेगा क्योंकि आखिरी उनकी रजामंदी के ये खेल संभव नहीं है। मेयर अनिल कल्ला ने इस टेंडर की प्रक्रिया से लेकर अन्य मुद्दों को लेकर 26 बिंदुओं पर जवाब मांगा है। आयुक्त ने जवाब नहीं दिया। अब मेयर उन्हें यूओ नोट जारी कर जवाब मांगने की तैयारी कर रहे हैं। मुख्यमंत्री की मंशा शहर को साफ रखने और लोगों को सुविधाएं देने की है। उसी के तहत उन्होंने हरी झंडी दिखाई और टिपर रवाना किए मगर अधिकारियों ने सरकार को अंधेरे में रखा। सीएम की झंडी के बाद भी टिपर पर ड्राइवर नहीं हैं। ना ​​टपर पहुंचे। टेंडर में भी सवाल हैं। श्याम सिंह हाड़ला, भाजपा पार्षद टेंडर में खुला भ्रष्टाचार हुआ है। इसमें इंजीनियर से लेकर अधिकारी तक मिले हुए हैं। मेरे पास तथ्य हैं। आंकड़े बोल रहे हैं। किसी भी थर्ड एजेंसी से जांच करा ले अगर टेंडर में भ्रष्टाचार साबित ना हो तो मैं हर सजा भुगतने को तैयार हूं। जावेद पड़िहार, कांग्रेस पार्षद भुगतान प्रणाली में भारी अंतर 1: पुरानी व्यवस्था (वजन आधारित): 2019-20 के टेंडर में भुगतान पूरी तरह से कचरे के वजन पर आधारित था। यदि प्रतिदिन 350 टन कचरा निकलता था तो 1017 रुपये प्रति टन के हिसाब से रोजाना 3,55,950 रुपये यानी महीने का लगभग 1.06 करोड़ और साल का 12.99 करोड़ रुपये भुगतान होता था। यदि कचरा कम होता तो भुगतान स्वतः कम हो जाता था। 2:नई व्यवस्था (फिक्स राशि आधारित): नया टेंडर 3 साल के लिए कुल 89 करोड़ रुपये का किया गया है। इसके हिसाब से साल का 29.66 करोड़, महीने का 2.47 करोड़ और रोजाना का 8,12,785 रुपये फिक्स भुगतान करना होगा। 3: तुलना: पहले 350 टन कचरा होने पर रोजाना 3.55 लाख रुपए देने पड़ते थे जबकि अब कचरा कम हो या ज्यादा, रोज 8.12 लाख रुपये फिक्स देने पड़ रहे हैं। यानी भुगतान सीधा दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। सबसे बड़ा पेंच यह है कि नया टेंडर घर-घर कचरा संग्रहण के आधार पर है वजन पर नहीं। यदि किसी दिन कचरा 350 टन की बजाय 250 टन ही निकले तब भी सरकार को 8.12 लाख रुपए पूरे चुकाने होंगे। वजन कम होने पर कटौती का कोई प्रावधान नहीं है 4: संसाधनों का खेल और बेमेल कैपेसिटी : पूर्व में निगम का काम सुचारू रूप से चल रहा था जिसमें लगभग 120-125 टैक्सियां, 60 ट्रैक्टर और निगम की 14 जेसीबी शामिल थीं। 5: तब टैक्सी: 85 लाख रुपए (मूल बिल 1.10 करोड़ में से घरों से कचरा नहीं उठाने व शिकायतों पर पेनल्टी काटकर भुगतान होता था)। ट्रैक्टर: 50-52 लाख रुपए (60 ट्रैक्टर सभी वार्डों में प्रतिदिन 2-2 ट्रिप करते थे)। जेसीबी: 14-15 लाख रुपए।