उदयपुर और सलूंबर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में स्वच्छता अभियान के दावों और धरातल की हकीकत में बड़ा अंतर सामने आ रहा है। जिला परिषद द्वारा स्वच्छता को लेकर जारी सख्त निर्देशों के बावजूद गांवों के स्कूलों में न तो सफाईकर्मी तैनात हैं और न ही ग्राम पंचायतों से मदद मिल रही है। हालात ये हैं कि शिक्षकों को अपनी जेब से भुगतान कर निजी हेल्पर रखने पड़ रहे हैं या खुद सफाई करनी पड़ रही है। प्रशासन ने कागजों में जिम्मेदारियां तो तय कर दी हैं, लेकिन जब तक पंचायतों द्वारा नियमित सफाईकर्मियों की तैनाती नहीं होगी, तब तक व्यवस्था सुधरना मुश्किल है। इस मामले में शिक्षा अधिकारी फिलहाल कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। अव्यवस्था के दो मामले: न बजट और न सफाईकर्मी केस 1 : महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय, सुरफलाया में सफाईकर्मी नहीं होने से कचरे के ढेर लगे हैं। स्कूल प्रभारी भैरूलाल कलाल ने बताया कि बच्चों से सफाई कराई नहीं जा सकती और बाहर से निजी व्यक्ति बुलाने पर भारी खर्च आता है। बजट के अभाव में शिक्षकों को स्वयं झाड़ू उठानी पड़ रही है। इधर, स्थानीय सरपंच बबली देवी का दावा है कि सूची तैयार कर ली है और जल्द सफाईकर्मी भेजेंगे। केस 2: यूपीएस मागावतों का गुड़ा की पीटीआई दीपा झाला ने बताया कि पंचायत से कोई सफाईकर्मी नहीं आता। परिसर को साफ रखने के लिए स्टाफ ने अपने स्तर पर निजी हेल्पर लगा रखा है। सफाई न करवाएं तो बच्चे भी परेशान होते हैं। गाइड लाइन में तय हैं जिम्मेदारियां: स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत जिला परिषद सीईओ ने विकास अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत संबंधित पंचायत विद्यालय परिसर (कक्षा-कक्षों को छोड़कर) और सामुदायिक स्वच्छता परिसर की नियमित सफाई करेगी। संस्था प्रधान शौचालयों का रखरखाव, पिंक टॉयलेट का संचालन और मरम्मत सुनिश्चित करेंगे। लापरवाही मिलने पर संयुक्त मॉनिटरिंग कर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।