भास्कर न्यूज| धौलपुर वन्यजीवों के सुखद आवास के लिए डीकेटीआर नया ठिकाना बनकर सामने हैं, जिसमें दुर्लभ और कम संख्या में बचे वन्यजीव कैराकल के लिए अच्छी खबर है। क्योंकि धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व में दुर्लभ कैराकल की सुखद मौजूदगी सामने आई है। जिसमें कैमरा ट्रैप में करीब 200 रिकॉर्ड किए गए हैं। जंगल में वन्यजीवों की जानकारी ट्रेप कैमरे से पता चलती है कि कौनसी प्रजाति कम व ज्यादा दिख रही है, लेकिन धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व में इनकी अच्छी संख्या सामने आई है, जिसका प्रमाण है ट्रेप कैमरों में इनकी पुष्टि होना। अगर कहें रणथंभौर, सरिस्का, मुकंंदरा, रामगढ़ टाइगर रिजर्व से सबसे ज्यादा कैराकल डीकेटीआर में देखे जा रहे हैं इससे प्रतीत होता है कि डीकेटीआर का जंगल वन्यजीवों के हैबिटॉट के लिए काफी उपयुक्त व सुरक्षित है। अफ्रीका, मध्य पूर्व, मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के दर्जनों देशों में पाई जाने वाली कैराकल मुख्य रूप से एक रात्रिचर बिल्ली प्रजाति है जो अपनी लंबी, नुकीली और काले गुच्छों वाली कानों के कारण पहचानी जाती है. यही इसे अन्य बिल्लियों से अलग बनाते हैं, जिससे इस जानवर को यह नाम मिला है. कैराकल शब्द तुर्की शब्द कर कुलक से लिया गया है, जिसका अर्थ है काले कान। उप वन संरक्षक डीकेटीआर तेजस पाटिल ने कहा रिजर्व इस मायने में अनूठा है कि यहां कैराकल की सबसे बड़ी आबादी है, जो देश के अन्य टाइगर रिजर्व में नहीं मिलती। डॉ खांडल भारतीय वन्यजीव संस्थान के प्रोजेक्ट कैराकल में सह-प्रधान अन्वेषक हैं और कैराकल: एन इंटिमेट हिस्ट्री ऑफ ए मिस्ट्रीयस कैट पुस्तक के सह-लेखक हैं। उनकी टीम वर्तमान में करौली-धौलपुर-बंध बारैठा लैंडस्केप में कैराकल के आवास का सर्वेक्षण कर रही है। उन्होंने कहा कि डीकेटीआर लैंडस्केप में कैराकल की देश में सबसे ज्यादा आबादी है, इसलिए इस क्षेत्र में इसके संरक्षण की विशेष आवश्यकता है। डीएफओ वी चेतन कुमार ने कहा कैराकल धौलपुर का गौरव है। इसलिए इनका संरक्षण हमारी प्राथमिकता है। आज इसकी बची हुई आबादी मुख्य रूप से राजस्थान के कुछ हिस्सों तक सीमित है। देश में कैराकल का क्षेत्र करीब 96 प्रतिशत घटा:- वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ धर्मेंद्र खांडल ने कहा कि देश में कैराकल का क्षेत्र करीब 96 प्रतिशत घटा है, लेकिन अच्छी बात ये है कि डीकेटीआर लैंडस्केप में कैराकल की देश में सबसे ज्यादा आबादी है, इसलिए धौलपुर-करौली का लैंडस्केप इसके भविष्य के लिए अहम माना जा रहा है। संस्था टाइगर वॉच के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ धर्मेंद्र खांडल ने बताया कि आजादी से पहले कैराकल देश के लगभग 7.94 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाया जाता था, जो वर्ष 2020 तक घटकर केवल 16,709 वर्ग किलोमीटर रह गया। यह करीब 95.95 प्रतिशत की गिरावट है।