तेरापंथ समाज के पर्युषण महापर्व का अंतिम दिवस तेरापंथ भवन आदर्श नगर सवाई माधोपुर में मैत्री दिवस के रूप में आयोजित किया गया। प्रवक्ता उपासक पारसमल दुगड़ ने बताया कि पर्युषण के आठ दिन साधना के थे, और नवां दिन है, साधना की सिद्धि का। इस दिन का नाम है कि क्षमा याचना दिवस अर्थात मैत्री दिवस। जैन धर्म में क्षमा को धर्म का पहला लक्षण कहा है। क्षमा वीरस्य भूषणम् वीर वही है जो क्षमा कर सके, और महावीर वही है जो क्षमा मांग सके। तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य श्री भिक्षु से लेकर आचार्य श्री महाश्रमण जी तक, सभी ने क्षमा को ही धर्म की आत्मा माना गया है। यह कोई औपचारिकता नहीं, आत्मा की सर्जरी है। साल भर में हमसे जाने-अनजाने कितने जीवों की हिंसा हुई, कितनों का मन दुखाया, कितनी बार झूठ बोला, अभिमान किया क्षमा याचना दिवस पर हम अपने उन सभी अपराधों को स्वीकार करते हैं। तेरापंथ की परम्परा में क्षमा याचना का सूत्र है कि खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे मित्ती मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणई।। अर्थात् मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरी सभी के साथ मैत्री है, किसी से वैर नहीं। कितना विशाल हृदय है! केवल अपने परिवार से नहीं, प्राणी मात्र से क्षमा। सहयोगी उपासक रमेश कुमार सिंघवी ने इस अवसर पर बताया कि तेरापंथ में क्षमा याचना के दो रूप हैं कि औपचारिक क्षमा, संवत्सरी के अगले दिन प्रत्येक साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका एक दूसरे के सामने हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाकर कर खमत खामना बोलता है जिसका अर्थ है मैं क्षमा देता हूँ और आपसे भी क्षमा की कामना करता हूं। वास्तव में क्षमा जीवन को सरल बनाने और वर्तमान की सभी समस्याओं का समाधान है आज के दिन हम क्षमा के माध्यम से विश्व शांति की दिशा में अनुगमन करें यही अपेक्षित है। इससे पूर्व विगत रात्रि को उपासक द्वय का मंगल भावना समारोह किया गया जिसमें तेरापंथ समाज की ओर से उपासक द्वय का आभार ज्ञापित करते हुए उनका अभिनंदन किया गया।