जैसलमेर की आराध्या एवं ऐतिहासिक आस्था केंद्र मां देगराय मंदिर के विकास को अब नई गति मिलने जा रही है। जोधपुर सांसद एवं केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने मंदिर के विकास के लिए भारत सरकार की ‘स्वदेश दर्शन योजना’ के अंतर्गत 11.84 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत किए जाने की जानकारी दी है। इस राशि से मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाओं का विकास किया जाएगा, साथ ही इस ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व वाले स्थल को पर्यटन की दृष्टि से भी विकसित किया जाएगा। आस्था का प्रमुख केंद्र है देगराय माता मंदिर केंद्रीय मंत्री शेखावत ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि जैसलमेर माँ देगराय की कृपा से आलोकित है। भाटी राजवंश की आराध्या और जैसलमेर की रक्षक देवी के रूप में पूजित माँ देगराय के प्रति जैसलमेरवासियों की आस्था शताब्दियों पुरानी है। भाटी राजवंश के संस्थापक से लेकर महारावल जैसल तक अनेक महान योद्धाओं ने रणभूमि में जाने से पूर्व माँ का आशीर्वाद लिया था। आज भी प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु माँ देगराय के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुविधा और उनकी आस्था का सम्मान सरकार की प्राथमिकताओं में है। जैसलमेर में बढ़ेगा धार्मिक व सांस्कृतिक पर्यटन केंद्रीय मंत्री शेखावत ने बताया - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकास भी, विरासत भी’ के विजन के अनुरूप आस्था और विरासत से जुड़े केंद्रों का विकास किया जा रहा है। इन विकास कार्यों से देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों के लिए इस ऐतिहासिक धरोहर को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकेगा। इससे जैसलमेर में धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलने की उम्मीद है, ताकि जैसलमेर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक उसी गरिमा के साथ पहुंचे। स्वांगियां मां समेत सातों बहनों की प्रतिमाएं स्थापित देवीकोट-सांकड़ा रोड पर स्थित देगराय मंदिर। ऐसी मान्यता है कि यहां पर बुगा सेलावत की भैंसा चरा करती थी। भैंसों के झुंड में एक राक्षस छिपकर रहता था। देवी स्वांगिया के आदेश पर बहादरिया ने अपनी तलवार से राक्षस रूपी भैंसे का वध कर दिया। इस दौरान स्वांगियां व उनकी बहनों ने भैंसे का रक्तपान किया और भैंसे के सिर को देग बनाकर उसमें खून गर्म कर अपनी ओढ़नियां रंगी। भैंसे के सिर को देग बनाने के कारण इस स्थान का नाम देगराय हुआ। मंदिर में प्रतिष्ठापित प्रतिमा में सातों देवियां को त्रिशूल से भैंस का वध करते हुए दिखाया है। मंदिर झीलनुमा तालाब पर बना है। बारिश से तालाब पानी से भर चुका है। तालाब की पाल पर मंदिर का दृश्य आकर्षण का केंद्र है। इतिहासकारों के अनुसार यहां कुछ समय के लिए आवड़ देवी विराजीं थी। 60 हजार बीघा में बारह कोसी ओरण, लाखों पशुओं का संरक्षण देगराय ओरण करीब 60 हजार बीघा में फैली है। ओरण में पेड़ काटने पर प्रतिबंध है। इस ओरण में लाखों पशुधन को चारा व पानी नसीब होता है। हाल ही में निजी कंपनियों की ओर से ओरण जमीन पर पेड़ काटने के विरोध में ओरण परिक्रमा लगाई थी। ओरण में ओरण में 250 प्रकार के पक्षी हैं। 15 से 20 प्रकार के जानवर और 18 अलग-अलग प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। महारावल अखेसिंह ने करवाया था मंदिर का जीर्णोद्धार देगराय के पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1798 में जैसलमेर के महारावल अखेसिंह ने करवाया था। मंदिर के प्रवेश द्वार व कई भवनों पर शिलालेख मौजूद है। इस मंदिर में आवड़ देवी की सातों बहनों की मूर्तियां स्थापित है। नवरात्रा में नौ दिन तक पूजा अर्चना होती है। हजारों श्रद्धालु देवी के दरबार में पहुंचते हैं। इस मंदिर के पुजारी पड़िहार राजपूत हैं। महारावल मूलराज के निर्माण कार्यों का भी शिलालेख मौजूद है। जसोड़ भाटियों में इस मंदिर की विशेष मान्यता है।