शांतिभवन में चल रहे महाप्रभावक पुच्छिस्सुणं संपुट जाप के दौरान श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि ने कहा कि महानता जन्म से नहीं, पुरुषार्थ से अर्जित होती है। ग्यारहवीं गाथा के जाप के बाद भावार्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि साधना और आत्मसामर्थ्य के बल पर सामान्य जीवन भी आदर्श बन सकता है। उन्होंने भगवान महावीर के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि चेतना में मौजूद सामर्थ्य को संकल्प और पराक्रम से प्रकट किया जा सकता है। महेन्द्र ऋषि ने कहा कि महावीर ने साधना के बाद लोकमंगल के लिए देशना दी। उनके अनुसार देशना में आयु, पद, प्रतिष्ठा या संपत्ति के आधार पर पात्रता तय नहीं होती। सत्य को जीवन में उतारने का पुरुषार्थ रखने वाला हर व्यक्ति इसका अधिकारी है। उन्होंने कहा कि ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, दूसरों के उत्कर्ष का मार्ग दिखाना भी है। गौशालक प्रसंग का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि एकांत साधना आत्मसिद्धि के लिए होती है, जबकि सिद्धि के बाद समाज के बीच रहकर भी अनासक्त रहना उच्च अवस्था है। उन्होंने साधना-पद्धतियों की भिन्नता को श्रेष्ठता-हीनता का आधार न बनाने की बात कही और समदृष्टि पर जोर दिया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचे।