देश में बेटियों के जन्म का अनुपात सुधरा है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के शुरुआती जिलों में हुए बदलावों पर एक रिसर्च में सामने आया कि हर 1,000 जन्म पर करीब 15 अतिरिक्त लड़कियों के जन्म का अनुमान है। इसका असर उन परिवारों में ज्यादा दिखा, जिनकी पहली संतान बेटी थी। 2015-16 में हर 1,000 लड़कों पर 919 लड़कियों का जन्म होता था। अब यह अनुपात बढ़कर 930 हो गया है। हालांकि, देश के 757 जिलों में से सिर्फ 26 में जन्म के समय लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि सुधार के बावजूद लैंगिक अंतर बना हुआ है। वहीं, शिक्षा के मामले में लड़कियां अब भी पीछे हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में 11वीं-12वीं की पढ़ाई पूरी करने वाले हर 100 लड़कों के मुकाबले सिर्फ 59 लड़कियां यह स्तर पूरा कर पाती हैं। पहली संतान बेटी होने पर दूसरी बेटी के जन्म की संभावना बढ़ी ‘पॉलिसी इंटरवेंशंस एंड द सेक्स रेशियो एट बर्थ: एविडेंस फ्रॉम इंडिया’ रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरी और उसके बाद की संतानों में लड़की के जन्म की संभावना 2.1% बढ़ी। जिन परिवारों की पहली संतान बेटी थी, वहां दूसरी संतान भी बेटी होने की संभावना 3.7 से 5.3 प्रतिशत अंक तक बढ़ गई। यानी ऐसे परिवारों में हर 1,000 जन्म पर 37 से 53 अतिरिक्त लड़कियों के जन्म का अनुमान है। इसके उलट, पहली संतान बेटा होने वाले परिवारों में कोई बदलाव नहीं मिला। 26 जिलों में लड़कों से ज्यादा लड़कियों का जन्म देश के 757 जिलों के आंकड़ों में 26 जिलों में जन्म के समय प्रति 1,000 लड़कों पर 1,000 से ज्यादा लड़कियां दर्ज की गईं। वहीं, 243 जिलों में यह अनुपात 950 से 1,000 के बीच रहा। इनमें रुद्रप्रयाग, कपूरथला, बारामूला, पुलवामा, उत्तरी गोवा, जैसलमेर और उडुपी शामिल हैं। गोवा, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और केरल जन्म के समय लिंग अनुपात के मामले में बेहतर स्थिति में हैं। शिक्षा को लेकर ‘शिक्षा तक पहुंच में लैंगिक समानता’ शीर्षक वाली यूनेस्को रिपोर्ट में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पढ़ाई के अंतर का अध्ययन किया गया है। भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मामले में हर 100 लड़कों के मुकाबले 89 लड़कियां यह स्तर पूरा कर पाती हैं।