राजस्थान में साइबर ठगी के मामले दर्ज करना आसान हुआ है, लेकिन जांच की रफ्तार बेहद धीमी है। प्रदेश में 23 जुलाई से 11 अक्टूबर तक 80 दिनों में साइबर ठगी के 3200 केस दर्ज हुए, लेकिन इनमें से महज 3% मामलों में ही पुलिस जांच शुरू कर पाई है। प्रदेश में 23 जुलाई 2026 से एक लाख रुपए या इससे अधिक की साइबर ठगी पर ई-जीरो एफआईआर की सीमा लागू की गई। पहले यह सीमा पांच लाख रुपए थी। इससे पीड़ितों के लिए मुकदमा दर्ज कराना आसान हुआ, लेकिन थानों में तकनीकी विशेषज्ञों, डिजिटल फोरेंसिक और अलग साइबर जांच टीम के अभाव में मामले अटक रहे हैं। साइबर अपराधियों का नेटवर्क दूसरे राज्यों तक फैला होने से जांच की चुनौती और बढ़ जाती है। स्थानीय थानों की पुलिस को कानून-व्यवस्था संभालने के साथ चोरी, मारपीट और दूसरे अपराधों की जांच भी करनी होती है। ऐसे में जामताड़ा या मेवात में बैठे साइबर अपराधियों तक पहुंचना मुश्किल है। साइबर ठगी की जांच में डिजिटल फोरेंसिक, बैंक खातों की मैपिंग, आईपी एड्रेस की ट्रैकिंग और सीडीआर-आईपीडीआर का विश्लेषण जरूरी होता है। लेकिन थानों में इसके लिए विशेषज्ञ और अलग जांच टीम नहीं है। सामान्य ड्यूटी संभालने वाले एक ही इंस्पेक्टर पर इन जटिल मामलों की जांच का भी जिम्मा है। नियमों के अनुसार एक लाख से एक करोड़ रुपए तक की ठगी की जांच जिला साइबर थाना या स्थानीय थाना कर सकता है। तीन साल में 5795 मुकदमे, अदालतों में 278 का निस्तारण प्रदेश में साइबर ठगी की शिकायतों और दर्ज मुकदमों के बीच बड़ा अंतर है। वर्ष 2024 में करीब एक लाख शिकायतें आईं, जिनमें 796 करोड़ रुपए की ठगी हुई। वर्ष 2025 में शिकायतें बढ़कर 1.27 लाख पहुंच गईं, जबकि ठगी की राशि 769 करोड़ रुपए रही। दूसरी ओर, वर्ष 2022 में 1833, वर्ष 2023 में 2435 और वर्ष 2024 में 1527 मुकदमे दर्ज हुए। यानी तीन वर्षों में कुल 5795 एफआईआर दर्ज हुईं।अदालतों में वर्ष 2022 में 80, वर्ष 2023 में 111 और वर्ष 2024 में 87 मुकदमों का निस्तारण हुआ। इस तरह तीन वर्षों में कुल 278 मामलों का निस्तारण हुआ। प्रदेश में एक साइबर थाना, बाकी 42 साइबर सेल; प्रदेश में एक ही साइबर थाना है, जबकि बाकी 42 साइबर सेल हैं। सभी पुलिस जिलों में अलग साइबर थाने नहीं हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक सभी पुलिस जिलों में साइबर थाने खोलने का लक्ष्य 2030 तक रखा गया है। राजधानी जयपुर में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चार पुलिस जिले हैं। साइबर ठगी का सबसे ज्यादा दबाव यहीं है, लेकिन चारों जिलों में अलग-अलग साइबर थाने नहीं हैं। यहां जांच इकाइयों के भरोसे काम चल रहा है। विशेषज्ञों और संसाधनों के बिना जांच कैसे होगी साइबर अपराधी तकनीक के मामले में पुलिस से दस कदम आगे हैं। ऐसे में साइबर एक्सपर्ट, अलग जांच टीम और जरूरी संसाधनों के बिना सिर्फ एफआईआर दर्ज करने से पीड़ित का पैसा कैसे वापस आएगा? जब तक जमीनी स्तर पर थानों को साइबर स्मार्ट नहीं बनाया जाएगा, तब तक प्रभावी जांच मुश्किल होगी। -सी.बी. शर्मा, रिटायर्ड आईपीएस