हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले स्थित शक्तिपीठ मां ज्वालामुखी मंदिर में गुरुवार शाम झालावाड़ के एक युवक ने खुद को आग लगा ली। घटना के बाद मंदिर परिसर में अफरा-तफरी मच गई। मौके पर मौजूद लोगों और मंदिर कर्मचारियों ने आग बुझाई। गंभीर रूप से झुलसे युवक को कांगड़ा अस्पताल ले जाया गया, जहां से टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। हिमाचल पुलिस के अनुसार मृतक की पहचान झालावाड़ बस स्टैंड क्षेत्र निवासी रामदास (40) पुत्र स्वर्गीय गजानंद के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार घटना गुरुवार शाम करीब 7 बजे मंदिर के गर्भगृह के बाहर हुई। सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और घटनास्थल की जांच की। फारेंसिक टीम ने भी साक्ष्य जुटाए। शव टांडा मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी में रखवाया गया है। झालावाड़ कोतवाली पुलिस से सूचना मिलने के बाद शुक्रवार दोपहर रामदास के चाचा और अन्य परिजन हिमाचल के लिए रवाना हुए। परिजनों की रिपोर्ट के बाद पोस्टमार्टम कर शव उन्हें सौंपा जाएगा। घटना के बाद रामदास को 108 एंबुलेंस से अस्पताल ले जाया गया। एंबुलेंस पायलट संजय और ईएमटी विवेक शर्मा के अनुसार रास्ते में वह होश में था। उसने अपना नाम और झालावाड़ का पता बताया। उसने बताया कि वह अकेला ही ज्वालामुखी मंदिर में दर्शन करने आया था। अस्पताल पहुंचने के बाद हालत गंभीर होने पर उसे टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। परिजनों के अनुसार रामदास करीब सवा साल पहले घर से चला गया था। परिवार ने रिश्तेदारों और परिचितों से जानकारी ली, लेकिन सुराग नहीं मिला। उसके चाचा प्रहलाद चंदेल ने बताया कि पारिवारिक मनमुटाव के बाद रामदास घर छोड़कर चला गया था। उसके पिता गजानंद की करीब 10 साल पहले मृत्यु हो चुकी है। रामदास कबाड़ का काम करता था और बाद में झालावाड़ के जेल रोड पर कपड़े की दुकान संचालित की। उसकी शादी रायपुर निवासी सलोनी से हुई थी। सलोनी झालावाड़ नगर परिषद में सफाईकर्मी हैं और वर्तमान में रायपुर स्थित अपने पीहर में रहती हैं। दंपती का 12 वर्षीय बेटा रुद्र है। सवा साल से परिवार से कोई संपर्क नहीं था, तलाशते रहे परिजनों के अनुसार रामदास के पिता गजानंद के कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने अपने छोटे भाई प्रहलाद चंदेल से रामदास को गोद लिया था। गजानंद ने उसे बेटे की तरह पाला और अपनी मृत्यु से पहले मकान व अन्य संपत्ति उसके नाम कर दी थी। परिजनों का कहना है कि पिता की मृत्यु के बाद रामदास का जीवन व्यवस्थित नहीं रहा। वह काम-धंधा नहीं करता था। मां चंद्रकला भी बाद में सुनेल स्थित अपने पीहर चली गईं और वहीं रह रही हैं।