झुंझुनूं के 26 हजार किसानों को कृषि विभाग की ओर से सरसों का बीज निशुल्क उपलब्ध करवाया जाएगा। इसके लिए 1040 क्विंटल बीज वितरण का लक्ष्य तय किया गया है। योजना के तहत हर किसान को 4 किलो बीज का एक मिनी किट दिया जाएगा। कृषि विभाग का जोर ऐसी किस्मों को बढ़ावा देने पर है, जो कम समय में तैयार हो सकें और खेती में पानी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए किसानों के लिए फायदेमंद हो। जिले में सामान्य श्रेणी के किसानों के लिए 865 क्विंटल और अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के किसानों के लिए 175 क्विंटल बीज आवंटित करने का लक्ष्य है। कृषि विभाग के अनुसार, बीज सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) तक पहुंचाया जा चुका है। अब किसानों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार परमिट लेकर बीज प्राप्त करना होगा। दो किस्मों के बीज मिलेंगे, हर किसान को एक किट योजना के तहत किसानों को सरसों की दो किस्मों आरएच-761 और टी-59 (इम्प्रूव्ड) के बीज उपलब्ध करवाए जाएंगे। बीज चार-चार किलो के मिनी किट में मिलेगा। एक किसान को केवल एक मिनी किट दिया जाएगा, ताकि निर्धारित लक्ष्य के अनुसार अधिक से अधिक किसानों तक बीज पहुंचाया जा सके। किसानों को बीज लेने के लिए अपने खेत की जमाबंदी की प्रति प्रस्तुत करनी होगी। इसके आधार पर संबंधित सहायक कृषि अधिकारी या कृषि पर्यवेक्षक से परमिट बनवाना होगा। परमिट के बाद निर्धारित सहकारी समिति या संबंधित वितरण केंद्र से बीज लिया जा सकेगा। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक (विस्तार) डॉ. मोहन दादरवाल बोले- राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन के तहत निशुल्क बीज वितरण का उद्देश्य किसानों को उन्नत किस्मों के बीज उपलब्ध करवाना और तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहित करना है। आरएच-761, करीब 140 दिन में तैयार होगी फसल आरएच-761 किस्म हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में विकसित की गई है। उपलब्ध कृषि संबंधी जानकारी के अनुसार, यह किस्म लगभग 140 दिन में पक कर तैयार होती है। इसकी संभावित उपज 25 से 27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है। इसमें तेल की मात्रा करीब 40 प्रतिशत है। दूसरी किस्म टी-59 (इम्प्रूव्ड) है। यह लगभग 120 से 130 दिन में पक कर तैयार होती है। इसकी संभावित उपज 10 से 12 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। इसमें तेल की मात्रा करीब 36 से 40 प्रतिशत तक बताई गई है। कम समय में तैयार होने वाली किस्में किसानों को रबी सीजन में उपलब्ध समय के अनुसार फसल की योजना बनाने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, कम अवधि में पकने का अर्थ यह नहीं है कि हर परिस्थिति में पानी की जरूरत कम ही होगी।