करौली में पितृपक्ष की शुरुआत होते ही 250 साल से भी पुरानी सांझी परंपरा जीवंत हो उठती है। धर्मनगरी और लघु वृंदावन के नाम से मशहूर करौली में यह 16 दिनों का उत्सव मंदिरों और घरों के आंगन में ब्रजमंडल के रंगीन स्वरूप से सजता है। कलाकार रंगों और आरेखों के जरिए भगवान कृष्ण की लीलाओं और ब्रज के 84 कोस परिक्रमा पथ के पावन स्थलों को जीवंत करते हैं। पुश्तैनी कलाकार विजय भट्ट बताते हैं कि राधा जी ने भगवान श्रीकृष्ण की याद में पितृपक्ष में यह परंपरा शुरू की थी। इतिहासकार वेणुगोपाल शर्मा के अनुसार, करौली में यह परंपरा श्री राधा मदन मोहन जी महाराज का विग्रह स्थापित होने के बाद शुरू हुई। पहले यह घर-घर निभाई जाती थी, पर अब मुख्य रूप से मदन मोहन जी मंदिर तक सीमित है। कलाकार उंगलियों से रंग भरकर मधुवन, बरसाना और नंदगांव जैसे स्थलों को उकेरते हैं। यह परंपरा करौली को खास पहचान देती है और हर साल हजारों भक्तों को अपनी ओर खींचती है।