10 कामकाजी महिलाओं ने स्मार्टफोन कैमरे से अपनी जिंदगी, अपने सपनों, रिश्तों, खुशियों और रोजमर्रा के अनुभवों को कैमरे में कैद कर 72 मिनट की सामुदायिक डॉक्यूमेंट्री ‘मस्त महिला मंडली’ तैयार की है। इसकी जयपुर में स्क्रीनिंग के दौरान सभागार में मौजूद दर्शक सिर्फ फिल्म नहीं देख रहे थे, बल्कि उन महिलाओं की जिंदगी को उनकी अपनी नजर से महसूस कर रहे थे। जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में रविवार को मुंबई के चैंबूर क्षेत्र की महिलाओं की फिल्म दिखाई गई। फिल्म में जिन महिलाओं की जिंदगी दिखाई गई है, वे केवल कैमरे के सामने मौजूद किरदार नहीं हैं। कैमरे के पीछे भी वही महिलाएं खड़ी हैं। उन्होंने खुद कैमरा संभाला, लोगों से बातचीत की, अपने अनुभव रिकॉर्ड किए और अपनी दुनिया की कहानी खुद कही। जब कैमरा हाथ में आया, तो बदली कहानी कहने की नजर फिल्म निर्माता और निर्देशक अंजुम शेख के साथ दर्शना मायकर, गौरी राणे, कविता खोमने, नाजनीन सिद्दीकी, रोहिणी कदम, रेहाना शेख, शीतल नवले, कविता घुग्गे और वैशाली माने ने फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई। इन महिलाओं ने टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) के मीडिया एवं कल्चरल स्टडीज विभाग से फिल्म निर्माण का प्रशिक्षण लिया। करीब दो वर्षों तक हर शनिवार उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म की सह-निर्देशक और TISS की प्रोफेसर शिल्पी गुलाटी के मार्गदर्शन में उन्होंने स्मार्टफोन कैमरा चलाने से लेकर ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू और एडिटिंग तक की तकनीक सीखी। शिल्पी गुलाटी फिल्म की सह-निर्देशक, सह-फैसिलिटेटर और संपादक भी हैं, जबकि कोरो इंडिया ने फिल्म के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बस्ती सिर्फ संघर्ष नहीं, जिंदगी भी है ‘मस्त महिला मंडली’ की कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि फिल्म ने बस्ती की महिलाओं को सिर्फ गरीबी, अभाव और संघर्ष के फ्रेम में कैद नहीं किया। कैमरे ने उनकी जिंदगी का वह हिस्सा भी दिखाया, जिसे अक्सर समाज की नजरें नजरअंदाज कर देती हैं। इसमें उनकी दोस्ती, हंसी-मजाक, शरारतें, सपने, इच्छाएं, आत्मविश्वास और छोटी-छोटी खुशियां शामिल हैं। फिल्म से जुड़ी नाजनीन सिद्दीकी ने कहा- बस्ती की महिलाओं की जिंदगी को हमेशा दुख और संघर्ष की कहानी की तरह देखने की जरूरत नहीं है। वे भी हंसती हैं, खेलती हैं, सपने देखती हैं और अपनी पसंद के मुताबिक जिंदगी जीना चाहती हैं। यही वजह है कि फिल्म कई जगह दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान लाती है और कई जगह उन्हें ठहरकर सोचने पर मजबूर करती है। रसोई में नाचती रेहाना और संविधान पढ़ती कविता फिल्म में रेहाना शेख का रसोई में खाना बनाते हुए नृत्य करने का दृश्य दर्शकों के बीच खासा चर्चित रहा। यह एक साधारण-सा दृश्य है, लेकिन इसी में फिल्म की असली खूबसूरती घर के काम के बीच भी अपनी खुशी के लिए जगह बनाती एक महिला के रूप में दिखती है। वहीं, कविता की भारतीय संविधान पढ़ने में रुचि महिलाओं के अधिकारों, समानता और संविधान को लेकर उनकी समझ को सामने लाती है। फिल्म में महिलाएं कबड्डी खेलती हैं। बाइक चलाती हैं और सामुदायिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करती दिखाई देती हैं। इन दृश्यों के जरिए फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि आखिर किसी महिला की पहचान सिर्फ उसके घर, परिवार या काम तक ही क्यों सीमित हो? उसके अपने सपने, पसंद, शौक और विचार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ‘राइट टू पी’ से शुरू हुई अपनी कहानी कहने की यात्रा कार्यक्रम में बताया गया कि ‘मस्त महिला मंडली’ की यात्रा कोरो इंडिया के करीब 15 साल पुराने ‘राइट टू पी- पेशाब का अधिकार’ अभियान से जुड़ी सामुदायिक पहल से शुरू हुई थी। शुरुआत में उद्देश्य महिलाओं के लिए स्वच्छता और सुरक्षित एवं सुलभ सार्वजनिक शौचालय के मुद्दे उठाना था। बाद में महिलाओं को स्मार्टफोन कैमरा देकर अपनी पसंद की तस्वीरें और वीडियो बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। कैमरा हाथ में आते ही महिलाओं ने अपने आसपास की दुनिया को एक नए नजरिए से देखना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि उनकी जिंदगी भी कहानी है। उनके रिश्ते, उनके सपने, उनकी परेशानियां, उनकी दोस्तियां, उनकी हंसी और रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाएं भी दर्ज किए जाने लायक हैं। इसी अहसास ने आगे चलकर ‘मस्त महिला मंडली’ को जन्म दिया। कैमरे का डर खत्म हुआ, आत्मविश्वास बढ़ा फिल्म निर्माण की शुरुआत में कई महिलाओं के लिए कैमरे के सामने आना आसान नहीं था। अपनी बात रिकॉर्ड करना, दूसरों का इंटरव्यू लेना और अपनी जिंदगी के निजी हिस्सों को कैमरे में दर्ज करना उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था, लेकिन ट्रेनिंग, लगातार अभ्यास और समूह के सहयोग ने धीरे-धीरे झिझक को आत्मविश्वास में बदल दिया। जिन हाथों ने रोजमर्रा के काम संभाले थे। उन्हीं हाथों ने कैमरा संभाला और अपनी दुनिया को अपनी नजर से रिकॉर्ड किया। स्क्रीनिंग के बाद हुए संवाद में इसी बदलाव पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा- कहानी कहने का अधिकार केवल पेशेवर फिल्मकारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। तकनीक अगर समुदाय के हाथ में पहुंचती है। उसे सही प्रशिक्षण मिलता है तो आम लोग भी अपनी जिंदगी और स्थानीय मुद्दों की प्रामाणिक कहानियां दुनिया तक पहुंचा सकते हैं।