आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही पंचायती राज चुनाव-2026 को लेकर गांवों में सियासी हलचल तेज हो गई है। जिले की 14 पंचायत समितियों के 248 सदस्य वार्ड, जिला परिषद के 41 वार्ड और 14 प्रधान पदों का आरक्षण तय होने के बाद लंबे समय से तैयारी कर रहे दावेदारों ने अब अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। कई दावेदारों के पुराने समीकरण बदले हैं तो कई नए दावेदारों के लिए चुनावी रास्ता खुला है। अब टिकट और चुनावी गणित के साथ गांवों में सड़क, पानी, बिजली, सिंचाई, स्कूल, हॉस्पिटल, पशु चिकित्सा, रोजगार और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे स्थानीय मुद्दे रहेंगे। निकाय चुनावों के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय संगठन भी अपनी पकड़ का आकलन करेंगे। आरक्षण की लॉटरी ने कई दावेदारों के समीकरण बदले जिला परिषद के 41 वार्ड, पंचायत समिति के 248 वार्ड और 14 प्रधान पदों का आरक्षण तय किया गया है। आरक्षण की घोषणा के बाद कई ऐसे संभावित दावेदारों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी है, जो लंबे समय से किसी खास सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। जिला परिषद के 41 वार्डों में सामान्य महिला के लिए 13, सामान्य वर्ग के लिए 12, ओबीसी महिला के लिए 4, ओबीसी के लिए 4, एससी महिला के लिए 3, एससी के लिए 4 और एसटी के लिए एक वार्ड आरक्षित किया गया है। अब नेताओं के सामने अपने समर्थकों के लिए उपयुक्त सीट तलाशने की चुनौती है। जिला परिषद के 41 वार्डों पर रहेगी नजर जिला परिषद के 41 सदस्यीय सदन पर इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर रहेगी। जिला प्रमुख का चुनाव निर्वाचित जिला परिषद सदस्यों के बीच से होगा। ऐसे में 41 वार्डों के नतीजे आगे के राजनीतिक समीकरण की नींव रखेंगे। जिला परिषद चुनाव में स्थानीय विधायकों, पूर्व जनप्रतिनिधियों, पार्टी पदाधिकारियों और प्रभावशाली नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रबंधन तक हर स्तर पर संगठन की ताकत की परीक्षा होगी। अब शुरू होगी टिकट की असली दौड़ आरक्षण के बाद राजनीतिक दलों के सामने प्रत्याशियों का चयन सबसे बड़ी चुनौती होगी। जिला परिषद और पंचायत समिति के लिए दावेदार अपने-अपने राजनीतिक संपर्कों के जरिए टिकट की कोशिश करेंगे। वहीं, आरक्षण के कारण जिन दावेदारों की सीट का समीकरण बदला है, उन्हें अब नए विकल्प तलाशने होंगे।