प्रतापगढ़ नगर परिषद में सभापति पद के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों की ओर से प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल कर दिया है। कांग्रेस की ओर से वार्ड-13 की ज्योति सोनी और भाजपा की ओर से वार्ड-35 की मनीषा जैन ने सभापति पद के लिए नामांकन दाखिल किया। बता दें प्रतापगढ़ नगर परिषद में कुल 40 वार्ड हैं। चुनाव नतीजों में कांग्रेस ने 20 वार्ड जीते हैं, जबकि भाजपा को 17 सीटें मिली हैं। इसके अलावा 3 निर्दलीय पार्षद भी चुनाव जीतकर परिषद पहुंचे हैं। ऐसे में बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीय अहम भूमिका में है। 40 सदस्यीय परिषद में सभापति चुनाव जीतने के लिए 21 पार्षदों का समर्थन जरूरी होगा। कांग्रेस 20 सीटों के साथ बहुमत से सिर्फ एक कदम दूर है, लेकिन उसके पास अपने दम पर बहुमत नहीं है। भाजपा 17 सीटों के साथ कांग्रेस से तीन सीट पीछे है। ऐसे में तीन निर्दलीय पार्षद अब सभापति चुनाव में अहम भूमिका में आ गए हैं। इसी वजह से तीनों निर्दलीय पार्षद इस चुनाव में किंगमेकर की भूमिका में दिख रहे हैं। इनके समर्थन से सभापति चुनाव का नतीजा बदल सकता है। कांग्रेस के सामने अपने एक बागी पार्षद को वापस साथ लाने की चुनौती है, जबकि भाजपा को तीनों निर्दलीयों को अपने पक्ष में करने के साथ-साथ कांग्रेस खेमे में सेंध लगाने की चुनौती होगी। कांग्रेस की ज्योति सोनी पर भरोसा, वार्ड 13 में भाजपा प्रत्याशी को 343 वोटों से हराया कांग्रेस ने सभापति पद के लिए वार्ड 13 की पार्षद ज्योति सोनी को अपना प्रत्याशी बनाया है। ज्योति सोनी ने नगर परिषद चुनाव में भाजपा की समता डोसी को 343 वोटों के बड़े अंतर से हराकर जीत दर्ज की थी।अब कांग्रेस ने इसी जीत के बाद ज्योति सोनी को सभापति पद की दौड़ में उतारा है। कांग्रेस के पास 20 पार्षदों का आंकड़ा होने के कारण पार्टी बहुमत के बेहद करीब है। ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने खेमे को एकजुट रखने और जरूरी समर्थन जुटाने की है। कांग्रेस के लिए एक निर्दलीय का समर्थन भी उसे सीधे बहुमत के आंकड़े 21 तक पहुंचा सकता है। ऐसे में कांग्रेस की नजर तीनों निर्दलीय पार्षदों के साथ-साथ अपने बागी पार्षद को मनाने पर भी रहेगी। भाजपा ने मनीषा जैन को उतारा भाजपा ने सभापति पद के लिए वार्ड 35 की पार्षद मनीषा जैन को प्रत्याशी बनाया है। मनीषा जैन ने नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस के मनोज सांखला को 72 वोटों के अंतर से हराया था। भाजपा के पास 17 पार्षद हैं और बहुमत के लिए 21 का आंकड़ा चाहिए। ऐसे में भाजपा को अपनी मौजूदा संख्या से चार पार्षदों का अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा। पार्टी के लिए निर्दलीय पार्षदों की भूमिका इसलिए और महत्वपूर्ण हो गई है। बगावत ने बढ़ाई दोनों चिंता सभापति चुनाव में सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला नहीं है। चुनाव परिणाम में सामने आए तीन निर्दलीय पार्षदों में भाजपा के दो बागी और कांग्रेस का एक बागी पार्षद शामिल है। यही वजह है कि दोनों दलों के सामने अपने-अपने असंतुष्ट पार्षदों को साधने की चुनौती बनी हुई है। कांग्रेस के सामने खास तौर पर अपने एक बागी पार्षद को मनाकर वापस साथ लाने की चुनौती है। यदि कांग्रेस अपने 20 पार्षदों को एकजुट रखने के साथ किसी एक अतिरिक्त पार्षद का समर्थन हासिल कर लेती है तो वह बहुमत के आंकड़े तक पहुंच सकती है। दूसरी ओर भाजपा के सामने अपने दो बागी निर्दलीयों को अपने पक्ष में लाने की चुनौती है।