राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) योजना ‘बीमार’ है। बच्चों में जन्मजात विकार, कुपोषण, गंभीर बीमारियों की जल्द पहचान के लिए चलाई गई योजना में 502 मोबाइल वैन में सिर्फ 305 की काम कर रही हैं। यानी 40 प्रतिशत टीम गायब है। इससे आंगनबाड़ी केंद्र, सरकारी स्कूल-मदरसों में बच्चों की नियमित स्क्रीनिंग प्रभावित हो रही है। इसके अलावा विशेषज्ञों के 232 स्वीकृत पदों में से 38 ही भरे गए। 194 पद (84 फीसदी) पिछले 10 साल से खाली हैं। यह खुलासा चिकित्सा​ विभाग की सालाना रिपोर्ट में हुआ है। उधर, लेखा महापरीक्षक (कैग) ने भी योजना को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी।इसके बाद भी जिला अर्ली इंटरवेंशन सेंटर की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। गौरतलब है कि आरबीएसके के तहत 18 वर्ष तक के बच्चों में 4 प्रमुख श्रेणियों जन्मजात विकार, पोषण संबंधी कमियां, बीमारियां तथा विकास में देरी एवं दिव्यांगता की पहचान की जाती है। यदि कोई बच्चा 40 चिन्हित बीमारियों में से किसी से भी पीड़ित मिलता है तो उसे जिला अर्ली इंटरवेंशन सेंटर अथवा मेडिकल कॉलेज में रेफर किया जाता है। जरूरत पड़ने पर मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य (एमएए) योजना के तहत निशुल्क सर्जरी भी कराई जाती है। लेकिन, आवश्यक स्टाफ की कमी से बच्चों की स्क्रीनिंग प्रभावित हो रही है। आयुष के 1024 पदों में सिर्फ 289 डॉक्टर ही कार्यरत हैं 352 ब्लॉकों में 512 मोबाइल हेल्थ टीमों में 305 टीमें ही काम कर रही हैं। इनमें भी चिकित्सकीय और तकनीकी कर्मचारियों की कमी है। 1,024 आयुष चिकित्सकों में 289 ही कार्यरत हैं। 735 पद रिक्त है। फार्मासिस्ट के 512 पदों में से 507 और एएनएम के 512 में 112 पद रिक्त है। बाल रोग विशेषज्ञ, मेडिकल ऑफिसर, फिजियोथेरेपिस्ट, ऑडियोलॉजिस्ट, मनोवैज्ञानिक, ऑप्टोमेट्रिस्ट और सोशल वर्कर सहित कुल 232 स्वीकृत पदों में से केवल 38 पर नियुक्तियां हुई हैं।