शहर के चाय-पानी के चबूतरे पर इतिहास की जानकारी के साथ ही विलुप्त हो चुकी आठ प्रजातियों के पौधे भी दिखाई देंगे। वन विभाग ने यहां प्लांटेशन शुरू कर दिया है। प्लांट माइक्रो रिजर्व के तहत इस संरक्षित क्षेत्र को फिर से आबाद किया जा रहा है। दरअसल, चाय-पानी के चबूतरे वाला क्षेत्र पहाड़ी के ऊपर है। यहां पर रियासतकाल में राजराणा साथियों के साथ प्राकृतिक नजारे देखने आते थे। इसीलिए यहां एक चबूतरे और कमरे का निर्माण करवाया गया था। वन विभाग की ओर से जीर्णोद्धार के बाद इस क्षेत्र को आरएफबीडीपी योजना में लिया है। इस दौरान देखा गया कि क्षेत्र में किसी समय लसोड़ा, गूगल, सहजन, पीला पलाश, गधा पलाश, करंज, अर्जुन सहित कड़ाया के पौधे बहुतायत में थे, जो अब विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसी को देखते हुए अब वन विभाग की ओर से यहां इन विलुप्त हो चुकी 8 प्रजातियों के 8 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य लिया है। अधिकतर पौधे तो लगाए भी जा चुके हैं। वन विभाग का मानना है कि इनमें से कई प्रजातियां तो औषधीय महत्व की हैं, जिसका भी फायदा मिलेगा। झालावाड़ रेंजर संजय शर्मा का कहना है कि चाय पानी के चबूतरे पर वैसे ही घना जंगल विकसित है, लेकिन अब विलुप्त हो चुके पौधे लगने से यह क्षेत्र अपनी खास पहचान बनाएगा। यहां पर गेट लगाया जा चुका है और बाउंड्रीवॉल भी हो चुकी है। लोग प्रकृति के बीच कुछ समय बिताने के लिए यहां आते हैं। बड़ी संख्या में इन दिनों लोग पिकनिक मनाने भी इस क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। अब यहां पर शिलालेख लगवाया जाएगा। इस शिलालेख में इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व बताते हुए विभिन्न जानकारियां मुहैया करवाई जाएंगी। ^चाय पानी के चबूतरे को विकसित किया जा रहा है। यहां पर 40 हैक्टेयर के क्षेत्र में विलुप्त हो चुके पौधे लगाए जा रहे हैं। इन पौधों के लगने से हमारी वन संपदा विलुप्त होने से बचेगी। - सागर पंवार, डीसीएफ