तेजाजी, तेजल और कंवर तेजा ये तीनों नाम राजस्थान के लोकदेवता तेजाजी महाराज के हैं, जिन्होंने एक सांप का वादा पूरा करने के लिए खुद की जीभ डसने के लिए आगे कर दी। तेजा दशमी के दिन नागौर के खरनाल तेजाजी मंदिर में बड़ी संख्या में अलग-अलग राज्यों से लोग दर्शन के लिए आते हैं। तेजाजी की कहानी आप तक पहुंचाने के लिए भास्कर टीम नागौर से 20 किलोमीटर दूर स्थित उनकी जन्म स्थली खरनाल गांव पहुंची। आज तेजाजी दशमी के मौके पर पढ़िए पूरी रिपोर्ट… खरनाल गांव में मंदिर पहुंचने से पहले दुकानें थीं, जहां महिलाएं दर्शन करने आए लोगों को प्रसाद खरीदने के लिए बुला रही थी। खरनाल के तेजाजी मंदिर में सबसे पहले हमारी मुलाकात दरियाव धौलिया से हुई जो तेजाजी के भोपा हैं। ऐसा कहते हैं कि तेजाजी का भोपा वही बन सकता है, जिसमें तेजाजी के प्रति भक्ति और सेवा की अटूट भावना हो। दरियाव धौलिया तेजाजी मंदिर के वर्तमान गादीपति भी हैं। दरियाव धौलिया ने बताया साल 1130 में तेजाजी का जन्म खरनाल के ताहड़ देव धौलिया और मां रामकंवरी के घर हुआ था। एक दिन तेजाजी दोपहर तक खेत में काम कर रहे थे। बहुत तेज भूख लग रही थी। भाभी खाना लेकर पहुंची। तेजाजी ने देर से खाने लाने का कारण पूछा। इस पर भाभी ने ताना देते हुए कहा कि वे अपनी पत्नी को मायके से क्यों नहीं ले आते। तेजाजी बिना खाना खाए ही तुरंत घर के लिए निकल गए। 9 माह की उम्र में तेजाजी की शादी हुई थी दरअसल तेजाजी खुद नहीं जानते थे कि वो शादीशुदा हैं। जब घर गए तो उनकी मां ने बताया कि जब वो 9 महीने के थे तो उनकी शादी पनेर गांव के रायमल झंवर की बेटी पेमल से हो गई थी शादी के दौरान पेमल के मामा और तेजाजी के ताऊ की लड़ाई हो गई थी। इसमें पेमल के मामा की मौत हो गई। उसी समय पेमल की मां ने अपनी बेटी को खरनाल नहीं भेजने की बात कह दी थी। दरियाव धौलिया के अनुसार, शादी का पता चलने के बाद तेजाजी अपनी घोड़ी लीलण पर सवार अपनी पत्नी को लाने पनेर निकले। तब उनकी उम्र 29 साल 7 महीने थी। जैसे ही तेजा ससुराल पहुंचे तो सास ने उन्हें कड़वे बोल सुनाए। नाराज होकर तेजाजी वापिस लौटने लगे। पत्नी पेमल ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन वे माने नहीं। तभी पेमल ने अपनी सहेली लाछा को भेजा। लाछा ने तेजा को मनाकर अपने घर में ठहराया था। लाछा की गायों के लिए 150 डाकुओं से भिड़े रात में लाछा की गायों को कुछ चोर ले गए। गायों को छुड़ाने के लिए लाछा ने तेजाजी से मदद मांगी। 150 डाकुओं से लड़कर तेजाजी गायें छुड़ा लाए, लेकिन एक बछड़ा वहीं रह गया था। बछड़ा लाने तेजाजी वापस गए। जब तेजाजी सुरसुरा(किशनगढ़) पहुंचे तो रास्ते में उन्हें जलता हुआ सांप दिखाई दिया। तेजाजी ने सांप को भाले की नोंक से वहां से हटा दिया। वो नागदेवता का रुप था, जो अपनी साथी नागिन की मौत के बाद खुद को खत्म करना चाह रहा था। सांप ने तेजाजी से कहा कि उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर रहे जीव को बचाकर बहुत बड़ा पाप किया है। अब वो उन्हें डसना चाहता है। इस पर तेजाजी ने सांप से कहा कि वो गाय के बछड़े को चोरों के चंगुल से छुड़ाने जा रहे हैं। लौटकर जरुर आएंगे। सांप के वादे को पूरा करने लौटकर आए लौटते वक्त तेजाजी उसी जगह पर आए जहां पर उन्होंने नाग को वचन दिया। नाग ने देखा कि तेजाजी के पूरे शरीर पर घाव के निशान है। नाग ने उनसे कह दिया कि शरीर पर तो खून और घाव के निशान है, मैं कहां डसूं। तेजाजी ने कहा कि उनकी जीभ पर खून और घाव नहीं है। नाग तेजाजी की जीभ पर डसने को तैयार हो गया। तेजाजी ने अपनी जीभ आगे की और नाग ने डस लिया। नाग ने तेजाजी को आशीर्वाद दिया कि आने वाले समय में दुनिया उनके वचन निभाने की ईमादारी के कारण उन्हें याद रखेगी। इसके बाद नाग ने प्राण त्याग दिए। पेमल ने पिता के वंश को नष्ट होने का श्राप दिया था तेजाजी के प्राण त्याग देने की ये खबर पनेर पहुंची तो पेमल दौड़ी-दौड़ी सुरसुरा पहुंच गई। दुखी पेमल ने गुस्से में अपने परिवार को श्राप देते हुए कहा, आज के बाद झंवर वंंश नहीं बढ़ पाएगा। पेमल तेजाजी की शरीर को गोद में लेकर आग में समाहित हो गई। लीलण घोड़ी तेजाजी का समाचार लेकर खरनाल गई थी दरियाव धौलिया के अनुसार तेजाजी की घोड़ी लीलण ने ही तेजाजी के समाचार को खरनाल गांव तक पहुंचाया। हैरानी की बात ये थी कि लीलण तो मात्र एक घोड़ी थी वो कैसे किसी को समाचार सुना सकती है। उस पर उन्होंने कहा कि लीलण कोई सामान्य जानवर नहीं थी। वो बहुत समझदार थी और इंसानी भावना को समझती थी। दरियाव धौलिया भास्कर टीम को खरनाल में तेजाजी मंदिर से 500 मीटर दूर बने एक तालाब के किनारे ले गए। तालाब की पाल पर एक मंदिर बना हुआ था। हम मंदिर के अंदर गए जहां पर लीलण की मूर्ति थी और उसी के पास जोत जल रही थी। लीलण की पूजा उसी तरह से हो रही थी जैसे किसी देवी-देवता की होती है। कहते हैं कि घरवालों को खबर देने के बाद लीलण ने यहीं अपने प्राण त्यागे। लीलण का समाधि स्थल इतिहास की उस घटना की आज भी गवाही देता है। गांव के लोग पूजा में लीलण के मंदिर में सांगरी, फली जैसी चीजें चढ़ाते हैं। धरती के अंदर समा गई थी तेजाजी की बहन भोपा दरियाव धौलिया ने बताया कि जब लीलण घोड़ी तेजाजी का समाचार लेकर खरनाल पहुंची तो उनकी बहन बुंगरी बाई और एक नायक समाज की कन्या गायें चरा रही थी। ऐसा कहा जाता है कि तेजा के बलिदान की खबर सुनते ही दोनों ने धरती मां को अर्ज की और धरती में समा गई। जिसके बाद बुंगरी बाई “माता” कहलाई। इसके बाद भास्कर टीम खरनाल तेजाजी मंदिर से करीब 3 किलोमीटर दूर बुंगरी माता मंदिर के लिए निकली। एक तालाब के किनारे बुंगरी माता और नायक कन्या का मंदिर बना हुआ है। मंदिर के पास तालाब को लेकर मान्यता है कि इसके पानी को लगाने से त्वचा के रोगों का समाधान हो जाता है। तेजाजी के पीछे पांच जीवों ने प्राण दिया बातचीत के दौरान दरियाव धौलिया ने बताया कि तेजाजी के बलिदान के बाद पांच लोगों तेजाजी की घोड़ी लीलण, नागदेवता, उनकी पत्नी पेमल, बहन बुंगरी बाई और नायक समाज की एक कन्या ने प्राण त्याग दिए थे। उनके अनुसार इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी के बलिदान पर 5 लोगों ने एकसाथ खुद की जीवनलीला भी समाप्त कर ली। तेजाजी के मंदिर से आज भी सांप निकलता है खरनाल में तेजाजी की कहानी जानने के बाद अब भास्कर टीम सुरसुरा गांव में उस जगह गई जहां पर नागदेवता ने तेजाजी को डसा था। यहां पर तेजाजी का मंदिर बना हुआ है। मंदिर में ही एक छोटा सा बिल बना हुआ है जिसे बंबी कहा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि इस बिल से तेजाजी के रूप में सांप निकलकर दर्शन देता है और थोड़ी देर बाद वापस बिल में चला जाता है। यहां पर तेजादशमी के दिन मेला लगता है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही है। सुरसुरा में ही लाछा गुजरी की एक बावड़ी है। दैनिक भास्कर टीम सुरसुरा के बाद तेजाजी के ससुराल पनेर गांव पहुंची। यहां पर पेमल का मंदिर बना हुआ है। पेमल की मूर्ति है जिसमें तेजाजी को गोद में लिए अग्नि में समाहित हो रही है। तेजा गायन केम्ब्रिज में पढ़ाया जाता है भास्कर टीम खरनाल के खेतों में काम कर रहे किसानों से मिली जो तेजा गायन गा रहे थे। किसानों ने बताया कि ये एक ऐसा गाना है जो होली से लेकर भाद्रपद पूर्णिमा तक गाया जाता है। मान्यता है कि इसे गाने के बाद बारिश आ जाती है। तेजा गायन में तेजाजी के जीवन की पूरी गाथा है। गाते समय हाथ में छतरी लेकर नाचते हुए गाया जाता है ताकि बारिश आ सके। किसानों ने तेजा गायन गाकर भी सुनाया। तेजा गायन केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने अपने लोकगीतों के सिलेबस में भी शामिल किया है। ट्रक और डंपर से लगाते हैं परिक्रमा खरनाल मंदिर से करीब 1 किलोमीटर दूर नागौर-जोधपुर हाईवे के किनारे तेजाजी की लीलण पर सवार एक बड़ी सी मूर्ति बनी हुई थी। भास्कर टीम वहां पहुंची तो देखा कि मूर्ति के चारों ओर एक ट्रक से परिक्रमा लगाई जा रही थी। परिक्रमा पूरी हुई तो हमने ड्राइवर जीवराज गुर्जर से बातचीत की। उन्होंने बताया- मैं अजमेर से आया हूं। ये हमारे किसानों के देवता हैं। ट्रक, गाड़ी या बाइक कुछ भी लो यहां पर परिक्रमा देने जरूर आते हैं। हल जोतने के यंत्रों का तेजाजी ने आविष्कार किया था
किसान परिवार से होने के कारण धान बोने के काम आने वाली बीजणी का आविष्कार भी तेजाजी ने किया था। (बीजणी जो कि हल के पीछे लगाई जाती है और उसी में धान डालकर बोया जाता है।) खरनाल के किसान रामप्रसाद ने बताया- हमारे यहां जब भी खेत में फसल बोने जाते है, जाने से पहले तेजाजी को नारियल चढ़ाकर और पूजापाठ करके याद किया जाता है। खेत में फसल बोेने के बाद तेजाजी से आशीर्वाद लिया जाता है। खरनाल में है तेजाजी का संकल्प स्तूप तेजाजी के बलिदान और वचन निभाने की सत्यता को साबित करता हुआ खरनाल में आज के समय में संकल्प-स्तूप बना हुआ है। स्तूप पर तेजाजी की प्रेरणा से सच बोलने और अपने वचन निभाने की बात कही गई है। वहीं पर स्तूप की देखरेख करने वाले बताते है कि संकल्प स्तूप सत्य वचन, प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण करने की बात कहता है। इनपुट सहयोग-रोहित पारीक