सरकारी अस्पतालों में संस्थागत मौतों के बाद बनने वाले मेडिकल प्रमाण पत्र (एमसीसीडी फॉर्म) के 2 लाख 80 हजार 954 मामले प्रदेशभर में अटके हुए हैं। इन मामलों में मौत की वजह दर्ज नहीं की है। यह स्थिति तब है, जब चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग पहले ही अस्पतालों को मृत्यु का सही कारण दर्ज करने, प्रमाण पत्र अनिवार्य रूप से भरने के निर्देश दे चुका है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशालय ने अब सभी सीएमएचओ को इन्हें दुरुस्त करने के निर्देश दिए हैं। पहचान पोर्टल पर लंबित मेडिकल प्रमाण पत्र के मामलों का प्राथमिकता से निस्तारण कराने की बात कही है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि संस्थागत मृत्यु की घटनाओं में मृत्यु प्रपत्र भरते समय मृत्यु का उचित, सही कारण दर्ज करना अनिवार्य है। इसके बावजूद प्रदेश में 2 लाख 80 हजार 954 मामले लंबित हैं। निदेशालय की रिपोर्ट के अनुसार 1 जनवरी से 7 सितंबर 2026 तक दौसा में 6 हजार 133 मौतें दर्ज हुईं। इनमें से महज 196 मामलों में एमसीसीडी कोड की एंट्री हुई। 5 हजार 937 मामले लंबित हैं। पेंडिंग केस में दौसा प्रदेश में 14वें नंबर पर है। इनमें उप रजिस्ट्रार स्तर पर 141, रजिस्ट्रार स्तर पर 55 मामलों की एंट्री दर्ज है। यह आंकड़ा जिले में मृत्यु के मेडिकल सर्टिफिकेशन की स्थिति उजागर कर रहा है। प्रदेश के आंकड़े भी कम चिंताजनक नहीं है। इस अवधि में कुल 3 लाख 59 हजार 871 मौतें दर्ज हुईं। एमसीसीडी कोड की मात्र 78 हजार 917 एंट्री हुई। इनमें उप रजिस्ट्रार स्तर पर 55 हजार 495, रजिस्ट्रार स्तर पर 23 हजार 422 एंट्री शामिल हैं। इसके बावजूद 2 लाख 80 हजार 954 मामले लंबित हैं। यानी मृत्यु पंजीकरण, मृत्यु के चिकित्सकीय कारण दर्ज करने की प्रक्रिया के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। विभाग ने राज्य स्तरीय अंतर विभागीय समन्वय समिति की जयपुर में 6 अक्टूबर को होने वाली बैठक से पहले इनके निस्तारण का लक्ष्य तय किया था। एमसीसीडी में जयपुर सबसे आगे, सलूंबर में सबसे कम लंबित एमसीसीडी प्रकरणों की संख्या के लिहाज से जयपुर सबसे ऊपर है। यहां 48 हजार 514 मौत के प्रकरणों में से 21 हजार 430 में मेडिकल कारण दर्ज नहीं हुए। इसके बाद जोधपुर में 10 हजार 106, उदयपुर में 10 हजार 699, भीलवाड़ा में 12 हजार 250, सीकर में 11 हजार 436 मामले लंबित हैं। यानी ज्यादा मृत्यु पंजीकरण वाले जिलों में भी हजारों प्रकरणों का बैकलॉग बना हुआ है। दूसरी तरफ सबसे कम लंबित प्रकरण सलूंबर में 2 हजार 761 हैं। इसके बाद फलौदी में 2,376, जैसलमेर में 2,157 मामले लंबित हैं। हालांकि कम लंबित संख्या का मतलब बेहतर स्थिति नहीं है। इन जिलों में कुल मृत्यु पंजीकरण भी अपेक्षाकृत कम है। प्रतिशत के लिहाज से सलूंबर में 99.4%, डीग में 98.8%, फलौदी में 98.0% मामले लंबित हैं। मौत का कारण दर्ज करना जरूरी, फिर भी लंबित मामले: मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज ऑफ डेथ (एमसीसीडी) के तहत मृत्यु का चिकित्सकीय कारण दर्ज किया जाता है। इसका उद्देश्य मृत्यु के कारणों से संबंधित सही आंकड़े जुटाना है। ताकि स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं, नीतियों के लिए विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध हो सके। टॉप-10 में अजमेर-कोटा भी जिलों के सीएमएचओ, पीएमओ को 3 दिन में सभी केस में मौत की वजह दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। -डॉ. प्रवीण असवाल, अतिरिक्त निदेशक, ग्राम स्वास्थ्य, जयपुर