भास्कर न्यूज | राजसमंद नगर परिषद चुनाव में इस बार शहर के मतदाता प्रत्याशियों से पिछले पांच साल के कामकाज का हिसाब मांग रहे हैं। पेयजल संकट, टूटी सड़कें, जलभराव, बंद रोड लाइट और ठप सीवरेज जैसी मूलभूत समस्याओं से जूझ रही जनता अब चुनावी वादों के बजाय जमीन पर हुए काम को आधार बनाकर मतदान के मूड में है। नए परिसीमन से बदले समीकरण और सभापति पद सामान्य होने से भाजपा-कांग्रेस के साथ निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका भी अहम हो गई है। ऐसे में मैदान में उतरे दिग्गजों के सामने मतदाताओं को विकास कार्यों का जवाब देना बड़ी चुनौती बन गया है। पिछले कार्यकाल में राजनीतिक खींचतान का असर शहर के विकास पर भी पड़ा। पूर्व सभापति के कार्यकाल में अनिवार्य बजट बोर्ड की केवल 5 बैठकें हो सकीं। इसके चलते सीवरेज लाइन, डंपिंग यार्ड, सार्वजनिक शौचालय, रोड डिवाइडर, नाला-नालियों की सफाई और ड्रेनेज सिस्टम जैसे काम अटके रहे। पार्कों के रखरखाव और विकास को लेकर भी स्थिति संतोषजनक नहीं रही। अब मतदाता प्रत्याशियों से इन्हीं मुद्दों पर सवाल कर रहे हैं। नए परिसीमन के बाद जुड़े क्षेत्रों के करीब 20 वार्डों में नए चेहरे चुनाव मैदान में हैं। इससे कई दिग्गज नेताओं और पूर्व पार्षदों का पुराना चुनावी गणित बदल गया है। सभापति पद सामान्य होने से भाजपा और कांग्रेस दोनों में दावेदारों की संख्या बढ़ी है। टिकट वितरण के बाद उपजी गुटबाजी और बगावत से दोनों दल परेशान हैं। कई वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं। 45 में 23 का आंकड़ा सबसे अहम: नगर परिषद में बहुमत के लिए 23 पार्षदों का आंकड़ा जरूरी है। निर्दलीय प्रत्याशियों की मजबूत मौजूदगी ने भाजपा और कांग्रेस के सामने अपने दम पर बहुमत हासिल करने की चुनौती बढ़ा दी है। किसी भी दल को 23 सीटें नहीं मिलने पर बोर्ड बनाने और सभापति की कुर्सी तक पहुंचने में निर्दलीय पार्षद निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।