नंगे पैर, न पद का रौब, न रसूख का अहंकार... मेवाड़ की माटी का लोक अनुष्ठान ‘गवरी’ जब शुरू होता है तो बड़ी-बड़ी डिग्रियां आस्था के आगे नतमस्तक हो जाती हैं। मेवाड़ के इस प्रसिद्ध 40 दिवसीय लोक नृत्य-नाट्य में इन दिनों एक अद्भुत तस्वीर देखने को मिल रही है, जहां डॉक्टर, शिक्षक, स्पोर्ट्स कोच जैसे पदों पर बैठे आदिवासी युवा गांव-गांव गवरी खेलने पहुंच रहे हैं। गवरी खेलने वाले ये सभी पात्र 40 दिनों तक जूते-चप्पल, मांस-मदिरा, हरी सब्जी और खाट का त्याग कर कड़े नियमों का पालन करते हैं। ऊंचे पदों पर तैनात इन अधिकारियों का अपनी जड़ों से यह जुड़ाव साबित करता है कि आधुनिकता के दौर में भी मेवाड़ की लोक-संस्कृति की जड़ें बेहद मजबूत हैं। कड़े नियम...40 दिन जूते-चप्पल, मांस-मदिरा, हरी सब्जी तक का त्याग गणेश लाल : डॉक्टर निभा रहे हैं बंजारे व कृष्ण का किरदार हवाला गांव की गवरी में बंजारे का किरदार निभा रहे गणेश लाल डॉक्टर हैं। वे एमबीएच में तैनात हैं। वे ड्यूटी के बाद मां गौरज्या की भक्ति स्वरूप गवरी का मंचन करते हैं। वे कहते हैं, हम चाहे जितने पढ़-लिख जाएं, परंपराओं को नहीं छोड़ सकते। खेमराज गमेती : टेनिस कोच गवरी में बने गोमा का भाई खेलगांव में लॉन टेनिस कोच खेमराज गमेती सुबह बच्चों को टेनिस सिखाते हैं और फिर बेदला की गवरी में ‘गोमा के भाई’ का रोल करते हैं। वे कहते हैं कि आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ना हम सबकी साझी ज़िम्मेदारी है। भगवानलाल: सुबह शिक्षक, दोपहर में भिंयावड का स्वरूप बछार गांव के भगवानलाल गमेती गवरी मंचन में भिंयावड का किरदार निभा रहे हैं। पेशे से वरिष्ठ शारीरिक शिक्षक भगवान सुबह स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हैं। दोपहर में गवरी के मैदान में उतरकर कला का प्रदर्शन करते हैं।