संस्कृत भारती की ओर से सोमवार को हुए संस्कृत सप्ताह के समापन समारोह में एक बड़ा विरोधाभास सामने आया। बोर्ड परीक्षाओं में संस्कृत में 100 में से 100 अंक प्राप्त करने वाले मेधावी विद्यार्थियों और पीएचडी उपाधि प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों का सम्मान तो किया गया, लेकिन शत-प्रतिशत अंक लाने वाले ज्यादातर विद्यार्थियों ने आगे संस्कृत से किनारा कर लिया। मौजूदा दौर में बच्चों का रुझान नीट-जेईई जैसे तकनीकी व करियर ओरिएंटेड विषयों की ओर अधिक है। ऐसे में संस्कृत केवल परीक्षा पास करने और स्कोर सुधारने का जरिया बनकर रह गई है। सुविवि के प्रो. नीरज शर्मा के अनुसार विश्वविद्यालय में हर साल संस्कृत पीएचडी की सभी सीटें भर जाती हैं, लेकिन इस भाषायी और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है। संस्कृत से घटते रुझान के बीच उदयपुर के पीएचडी होल्डर्स इस भाषा को सहेजने और बच्चों में रुचि जगाने में जुटे हैं। भास्कर ने इनके प्रयास और अनुभव जाने। निष्ठा और जुनून से संस्कृत की अलख जगा रहे, ताकि फले-फूले देवभाषा डॉ. अंकिता आर्य: 2025 में पीएचडी पूरी करने वाली डॉ. अंकिता आर्य बचपन से हवन-मंत्रोच्चार के माहौल में पली-बढ़ीं। 2016 से अध्यापन से जुड़ीं अंकिता अब पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में अभिभावकों को संस्कृत का महत्व समझाती हैं। उनका मानना है कि संस्कारित भाषा से ही बच्चों में नैतिकता आएगी। डॉ. मीनाक्षी त्रिवेदी: जून 2026 में पीएचडी करने वाली डॉ. मीनाक्षी त्रिवेदी की बचपन से संस्कृत में रुचि थी। उनका मानना है कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। आज जब बच्चों का रुझान नीट-जेईई की ओर बढ़ रहा है, तब इसके महत्व को समझाकर नई पीढ़ी को पुनः इससे जोड़ना जरूरी है। डॉ. नानूराम मीणा: 2025 में पीएचडी पूरी करने वाले डॉ. नानूराम मीणा ने संस्कृत को पढ़ा ही नहीं, बल्कि जीया है। वे कहते हैं कि संस्कारी भाषा को पुनर्जीवित करना होगा। राजस्थान में संस्कृत स्कूल होने के बावजूद नियुक्तियां न होना चिंताजनक है, इसलिए युवाओं को जागरूक करना जरूरी है। डॉ. जूली सोनी: 15 वर्षों से अध्यापन करा रहीं डॉ. जूली सोनी ने उपदेशों से जीवन की वास्तविकता समझी। वे कहती हैं कि बच्चे संस्कृत केवल परीक्षा पास करने के लिए पढ़ते हैं। ऐसे में प्राचीन उपदेशों व व्यावहारिक उदाहरणों से जोड़कर उनके मन में इस भाषा के प्रति सच्ची रुचि जगा सकते हैं। डॉ. कुलदीप जोशी: 2025 में पीएचडी पूरी करने वाले डॉ. कुलदीप जोशी को संस्कृत की विरासत पिता और दादा से मिली। 16 वर्षों से अध्यापन करा रहे डॉ. कुलदीप जोशी की 2013 में पीएचडी अधूरी रही, पर 2022 में नए जुनून से शुरुआत कर इसे पूरा किया। अब नए तरीकों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं।